Sunday, 28 December 2014

सवाल उठाती जर्द चेहरों की सर्द मौतें


  ( L.S. Bisht ) -     सर्द मौसम अब अपनी बुलंदी पर है | सुबह, दोपहर और रात का हर लम्हा तारीख-दर-तारीख अपने मे कुछ और ठंड समेटे आगे बढ़ रहा है | बढ्ती इस ठंड के साथ दूरदर्शन का छोटा पर्दा समाचारों के अंत में बडे रोचक ढंग से न्यूनतम तापमान की जानकारी भी दे रहा है | कुछ न्यूज चैनल तो मानो ठंड का लाइव टेलीकास्ट कर रहे हों | परंतु इन सब के बाबजूद ठंड से हो रही मौतों का सिलसिला जारी है ।
     ठंड से बेजान हो रहे जिस्म सिर्फ़ इस बार की कहानी नही हैं, बल्कि हर साल इसी तरह इसी मौसम में यह ठंड सैकडों लोगों के जिस्म को बेजान कर देती है | इन अकाल मौतों की सबसे बडी त्रासदी तो यह है कि यह कभी भी सरकारी स्तर पर कोई महत्वपूर्ण खबर या हादसा नहीं बनती और इसी तरह इन ठंडी मौतों का सिलसिला साल-दर-साल जारी रहता है |
     यह मौतें जब सरकारी कागजों मे जगह नही पातीं तो आंकडा भी नही बनतीं फ़िर भी यदि अखबारों की कतरनों को ही इन हादसों का गवाह मानें तो स्थिति कुछ समझ में आती है | ठंड के इस प्रकोप का सबसे अधिक शिकार बनता है उत्तर भारत | अब तक यहां इससे 100 से अधिक मौतें हो चुकी हैं | देश की राजधानी कही जाने वली दिल्ली मे भी अब तक चार लोग इस जानलेवा ठंड के शिकार बन चुके हैं | उत्तर प्रदेश मे इस ठंड ने अपना कहर मुख्यत: पूर्वाचंल क्षेत्रों मे बरपाया है जिनमे जौनपुर, मिर्जापुर, भदोही, बनारस, चंदोली, कानपुर व गाजीपुर बुरी तरह प्रभावित हैं | यहां न्यूनतम तापमान 2 से 4 डिग्री के बीच ही हिचकोले खा रहा है | कहीं कहीं तो यह जमाव बिंदु के आसपास रेंगने लगा है |
     उत्तर प्रदेश ही नही बल्कि राजस्थान, पंजाब-हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, मध्यप्रदेश, दिल्ली और उत्तराखंड मे हर साल इसके कहर से लोग अकाल मृत्यु के ग्रास बनने को अभिशप्त हैं | 2012 व 2013 के सरकारी आंकडें बेशक बहुत डरावने न हों लेकिन यह आंकडे सच के गवाह भी नही होते | और जब होने वाली मौतें अनाम हों, तब इन आंकडों की सच्चाई की विश्वसनीयता स्वत: कम हो जाती है |
     `यदि हम इस पहलू को मानवीय नजर से देखें तो पता लगता है कि मौसम विशेष में अखबारों के किसी कोने मे छ्पने वाली ये खबरें बार-बार छ्पने के बाद अपना संवेदन एक तरह से खो देती हैं | इन्हें हर दो-एक दिन के अंतराल पर पढना एक सामान्य खबर को पढने जैसा हो जाता है | परिणामस्वरूप यह पाठकों के मन-मस्तिक को कचोट नही पातीं | दूसरी तरफ़ यदि हम इस त्रासदी को सरकारी नजरिये से देखें तो यहां हमें एक अलग तस्वीर दिखाई देती है | जब जब इस तरह की घटनाएं पत्रों मे छ्पती हैं, सरकार इन्हें “ ठंड से मौत “ का लबादा पहना किनारे हो जाती है |
     यह सच है कि मौतें ठंड से होती हैं, परंतु क्या मात्र ठंड ही इसका एक मात्र कारण बनती है ? यदि ठंड को कटघरे मे खडा कर दिया जाए तो देश के बाकी करोडों लोगों के जिस्म को य्ह ठंड क्यों नही बेजान जिस्म मे बद्ल पाती ?
     इसके साथ ही इस संदर्भ मे यह तथ्य भी कम मह्त्वपूर्ण नही कि इन मौतों का साया पूरे प्रदेश मे नही बल्कि देश के अपेक्षाकृत कुछ पिछ्डे हिस्सों मे ही पडता है | यदि ह्म इन हिस्सों पर केंद्रित हो पड़ताल करें तो पता चलता है कि यहां भी एक वर्ग विशेष ही इसका शिकार बनता है | सवाल उठता है कि समाज का यह वर्ग ही क्यों इस दुख से अभिश्प्त है |
     सच तो यह है कि जिन मौतों को ठंड से हुई मौतों का जामा पहना दिया जाता है, उसके पीछे कई महत्वपूर्ण कारण होते हैं | इन कारणों को जानने का प्रयास सरकारी स्तर पर शायद ही कभी हुआ हो | यहां तो ठंड ही एक्मात्र मुजरिम के रूप मे खडी दिखती है | अगर दुनिया के भौगोलिक परिवेश को देखें तो पता च्लता है कि दुनिया के कई देश इससे भी कहीं ज्यादा ठंड का प्रकोप झेलते हैं लेकिन वहां कोई मौत नही होती | सवाल उठता है आखिर ऐसा क्यों | दर-असल सच्चाई तो यह है कि यह मौतें ठंड से नही बल्कि भूख से होती हैं और यह भूख उन पर कहर बरपाती हैं जो जीवन की न्यूनतम आवश्यक्ताओं से भी वंचित हैं | यानि रोटी, कपडा और मकान जिनके लिए आज भी एक बडा सपना बना हुआ है
     ठंड की मार वस्तुत: इन्हीं खाली पेटों पर पडती है और फ़िर तथाकथित ठंड से मौत का बैनर इन्हीं अकाल मौतों पर लगा कर चुप्पी साध ली जाती है | पेट मे भोजन न हो परंतु शरीर मे पर्याप्त कपडे व सर पर छ्त होने पर भी ठंड से लडने की बात एक बार सोची जा स्कती है  परंतु यहां भी इस वर्ग के बेबस लोगों के पास कपडों के नाम पर चंद चिथडे व छ्त के नाम पर नीला आकाश दिखाई देता है | जीने की लालसा मे अगर यह कहीं झुग्गी बना भी लें तो भी यहां इनकी स्थिति “ नभ की छ्त , दीवारें कांपती हवाओं की, सावन के पंखहीन तोते हैं लोग यहां “ जैसी होती है | हवा का एक झोंका भी इन्हें पानी मे भीगने या धूप मे तपने को मजबूर कर देता है |
     इस तरह खाली पेट, तार तार हुए कपडे पहने , खुले आकाश की छ्त के नीचे रहने वाले ये इंसान कब तक मौत से जूझ सकते हैं, इस्की कल्पना की जा सकती है |
     इस तरह मात्र ठंड का सरकारी तर्क या तो बुध्दि से हीन प्र्शासकों का सतही नजरिया है अथवा प्र्शासनिक मशीनरी की एक धूर्त चाल, जो येनकेन अपना दामन बचाना अपना पहला कर्तव्य मानती है | हाशिये पर पडे लोगों के जीवन की शर्मनाक हालातों को वह इन मौतों के लिए जिम्मेदार नही मानती या फ़िर नही मानना चाहती | अंतत: सवाल उठता है कि एक वर्ग विशेष के साथ ही ऐसा क्यों ? दर-असल इसके पीछे है हमारी विकास की गलत नीतियां जो इस तरह से बनाई गई कि उनका लाभ उच्च व मध्यम वर्ग तक ही सीमित रहा | समाज का एक बडा वर्ग इन विकास नीतियों से अछूता ही रहा | आज ठंड की मार इसी वर्ग पर पडती है |
     ऐसा नही है कि हर साल ठंड से होने वाली इन मौतों को  सीमित नही किया जा स्कता | दर-असल यहां भी ठोस नीति व दूरदर्शिता का अभाव साफ़ दिखाई देता है | इन मौतों मे एक बडा हिस्सा उन लोगों का है जो या तो बेघर हैं या फ़िर रहने की उचित व्यवस्था नही जिससे वह ठंड के प्रकोप से बच सकें | ऐसे लोगों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था सबसे आसान व उचित कदम है | लेकिन देश मे बेघर लोगों के लिए इनका नितांत अभाव है | इनकी संख्या आसानी से बढाई जा सकती है | इसके अलावा ऐसे मौसम मे वैकल्पिक व्यवस्था जहां अलाव या हीटर की सुविधा हो की जानी चाहिए लेकिन कभी इस दिशा मे सोचा ही नही जाता |

     योजना आयोग ने भी रैन बसेरों की आवश्यकता पर विशेष बल दिया है | आयोग के एक द्स्तावेज के अनुसार देश के 12 शहरों मे रैन बसेरों की आवश्यक्ता प्रतिवर्ष बढ रही है | इसमें कोलकता, मुंबई, दिल्ली, चैन्नई, बंगलूरू, अहमदाबाद, हैदराबद, कानपुर, नागपुर , पुणे और लखनऊ हैं | कुछ शहरों ने पहल की है लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है | यह सच है कि कम्बल बांट लेने या फ़िर अलाव जला देने मात्र से यह समस्या हल नही होने वाली | इसके लिए दीर्घकालीन व ठोस प्रयासों की आवश्यकता है | अब जरूरी है कि मौसम की मार से होने वाली इन मौतों पर सरकार उपेक्षित रवैया न अपनाए । यह हर साल की कहानी है और इंसानी  जिंदगी का सवाल ।  

Saturday, 29 November 2014

अवध की मुजरेवालियां

     

( यह फ़ीचर ‘ मुक्ता ‘ पत्रिका के फ़रबरी,1987 के अंक में आवरण कथा के रूप में प्रकाशित हुआ था । लखनऊ महोत्सव के अवसर पर इसे अपने ब्लाग में पुन: प्रकाशित किया है | मुक्ता के लिए इस फ़ीचर को लिखने में जिन परेशानियों से गुजरना पड़ा उसकी एक अलग दास्तां है   )

----- बनारस की सुबह की तरह कभी लखनऊ की शाम भी मशहूर थी | लेकिन रोमानियत से भरी वह शाम अब लगभग ढ्ल चुकी है | रंगीनियों का दौर बदल चुका है | इत्र और गुलाब की महक कम हो गई है और घुंघरूओं की झंकार भी धीमी पड़ चुकी है |
     अब न वे मुजरेवालियां रहीं और न वे मुजरे | हकीकत की वह दुनिया अब लखनऊ में कहीं नहीं दिखती,सिवाय कुछ भूलती बिसरती जा रही यादों के | वे गलियां अब सूनी पडी हैं | कहीं किसी अंधेरे कोने में कुछ पुरानी सांसों को छोड कर, जिन के पास है दिलकश मुजरों की यादें और मुजरेवालियों की रंगीन दुनिया के तमाम एहसास |
     फ़ूलवाली गली, जिस में कभी पायलों की झंकार और मुजरों की सुरीली आवाजें गूंजा करती थीं, अब एक भीड़ भरी गली से ज्यादा कुछ नहीं | अब लोग जानते हैं उस चावल वाली गली को, जो मुजरों की कब्रगाह है | जहां अब राग-रागिनियों का नहीं, बल्कि जिस्म का सौदा होता है | इसके गवाह हैं आसपास टहलते, मंडराते खाकी वरदी पहने कुछ इनसानी जिस्म |
     लेकिन ऐसा नहीं है कि वे मुजरे, दिलकश आवाजें पूरी तरह इतिहास में तब्दील हो गईं, अब भी उस दुनिया के कुछ खंडहर बाकी हैं, इस उम्मीद में कि शायद फ़िर क्भी अवध के गुजरे लमहे लौट कर आ जाएं |
     “ आप भी किस जमाने की बातें कर रहे हैं हुजूर “ चावल वाली गली की अब बूढी हो चली तवायफ़ कहती है, “ अब देख रहे हैं इस गली को, पूरे लखनऊ की सबसे बदनाम गली, कौन विश्वास करेगा कि कभी यहां नवाब और रईसजादे आते थे, लेकिन वह जमाना ही दूसरा था | एक से एक आला मुजरेवाली यहां इन कोठों में रहती थीं | तहजीब इतनी कि परदेसी के मुंह से आवाज न निकले मारे शर्म के | मुजरों की मांग इतनी कि यह फ़ैसला करना मुशकिल हो जाता था कि कहां जाएं ? किस को नाराज करें और किसे खुश | धीरे-धीरे सब खत्म हो गया | अब जो रह गया है वह तो आप देख ही रहे हैं , सिर्फ़ जिस्म का सौदा |
     सच भी है अवध में मुजरा व मुजरेवालियों की जिंदगी का इतिहास बहुत पुराना है | नवाबी दौर में इसे वही सम्मान व स्थान प्राप्त था जो मुर्गबाजी, कबूरतरबाजी, बटेरबाजी व पतंगबाजी को था |
     सही अर्थों मे अवध की नृत्यकला को जो शोहरत हासिल हुई, वह यहां की नाचने गानेवाली वेश्याओं के कारण ही मिली | पूरे देश में यहां की नर्तकियों का कोई सानी नहीं था | बताते हैं ल्खनऊ की तवायफ़ गौहरबाई ने अवध के बाहर दूर-दूर तक बहुत नाम कमाया | नजाकत व प्रणय का भाव जैसे यहां की नर्तकियां अभिव्यक्त करती थीं, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं था |
     शाम ढलते ही चौक की फ़ूलवाली गली में दिलकश तानें सुनाई देने लगती थीं | नफ़ीस कड़ाई में सजेधजे कुरते पहने, हाथों में गजरा लपेटे और मुंह में सुगंधित पान दबाए लोग कोठों में जमा होने लगते | रात होते-होते पूरी गली दिलकश बोलों और झंकारों से गूंजने लगती | रात में बहुत देर तक मुजरे होते रहते | लेकिन मजाल कि कोई गंदी हरकत कर ले | सिर्फ़ पैरों की थिरकन व आवाज का सौदा होता |
     दलालों (भडुओं) की भी अपनी शान थी | वे कुर्ता-पायजामा पहने, आंखों में सुरमा लगाए, दिन भर घूमा करते थे | बडे अदब से पेश आते थे | एक ही नजर में भांप लेते कि यह हुजूर मुजरे के शौकीन हैं और सही कोठा तलाश रहे हैं | बस सलाम करते और इतनी अदब से बात करते कि आखिर उन्हें इनके कहने पर इनके बताए कोठे पर ही जाना पडता |
     अवध का वह नवाबी दौर खत्म हुआ और उसी के साथ अवध की वह तहजीब भी खत्म होने लगी | मुजरेवालियों की दुनिया में साल-दर-साल अंधेरों का घेरा कसता गया | अब अपने को तवायफ़ बताने का मतलब है अपने को एक गाली देना | अब मुजरेवालियों की सोहबत शान व प्रतिष्ठा की बात नहीं बल्कि चरित्रहीनता समझी जाने लगी है |
     आर्थिक दबावों व बदलती संस्कृति ने मुजरेवालियों को वेश्यावृत्ति के गड्ढे मे धकेल दिया | भडुओं की भी वह शान नही रही | उन्हें अब जिंदा जिस्म का दलाल समझ कर हिकारत की नजर से देखा जाने लगा है | उस जमाने के कुछ भडुआ परिवारों ने तो मजबूरन जिंदगी के दूसरे रास्ते खोज लिए | मुजरों को संगीत में बांधने वाले साजिदों की हालत और भी बदतर है | पुराने लखनऊ में ऐसे बहुत से उजडे साजिंदे अब महज दिन काट रहे हैं |
     नाम न छापने के अनुरोध के साथ कुछ तवायफ़ों ने अवध की इस कला पर लंबी बातचीत की | कभी जगमगाते आबाद कोठों से लेकर अब दड्बेनुमा कोठरियों में गुंडों, दलालों व ग्राहकों के बीच कैद तिलमिलाती जिंदगी की परत-दर-परत दास्तान बताती हैं कुछ गए जमाने की तवायफ़ें और मौजूदा व्यवस्था की भंवर में फ़ंसी वेश्याएं |
     अब बदहाली मे दिन काट रही बूढी तवायफ़ बताती है “ उस जमाने के रईसजादे सलामत रहें, क्या लखनऊ बसाया था उन्होने | अब ठीक से तो याद नहीं,सुना था नवाब शुजाउद्दोला ने तवायफ़ों को बहुत सहारा दिया था | उनके बाद मुजरों की महफ़िल मे आना अमीरों का शौक ही बन गया था | उस समय भी कहा जाता था कि जब तक आदमी को वेश्याओं की सोहबत हासिल न हो, वह सही इन्सान नहीं बन सकता | हमारे देखे की बात है, क्या तमीजदारी थी उन तवायफ़ों में | आदमी एक बार बात कर ले तो गुलाम हो जाए | एक साहब थे हकीम मेंहदी | वह नवाब के मंत्रियों मे बहुत लायक समझे जाते थे | उन्हें इस ऊंचाई तक पहुंचाने मे उस समय की एक तवायफ़ प्याजू ने बहुत कुछ किया | बताते हैं अपनी दौलत भी उसने उनके कदमों पर रख दी | ऐसी मुहब्बत थी उनमें |
     चावल वाली गली की एक अंधेरी कोठरी में दयनीय जिंदगी जी रही वेश्या ने बताया “ लखनऊ में शेर ओ शायरी की महफ़िलें और गोष्ठियां हर  छोटे-बडे मुहल्ले में हुआ करती थीं | इनमें शरीफ़ व रईस लोग शामिल् होते थे | कुछ ऐसी तवायफ़ें भी थीं जो अपनी शालीनता व तहजीब के लिए दूर-दूर तक जानी जाती थीं | उनके यहां भी गोष्ठियां होती थीं और लोगों को वहां जाने मे शर्म या संकोच महसूस नहीं होता था | एक ऐसी तवायफ़ थी हैदरजान | उसके यहां नाच-रंग की महफ़िलों और गोष्ठियों का आयोजन होता था | बडे बडे अमीर वहां जाते थे | नसीमबानों और मेहरून्निसा नाम की तवायफ़ें भी अपनी तमीजदारी व खातिरदारी के लिए जानी जाती थीं | अब कहां रहीं वह तहजीब | उस जमाने की ज्यादातर तवायफ़ें तो आज नहीं रहीं | कुछ ने जिस्मफ़रोशी का धंधा अख्तियार कर लिया और थोडी बहुत बनारस चली गईं | नई लडकियां हैं, जिस्म बेचती हैं | तहजीब और अदब की समझ कहां ?
     यह दास्तां है गए जमाने की और अवध की उस कला की जो दम तोड रही है | मुजरों की जगह है बेसुरी आवाज और जिस्मफ़रोशी | लेकिन यह सब यकायक नही हुआ | जमाना बदला तो तहजीब बदली, लोग बदले और रूचियां बदलीं | एक तरफ़ आर्थिक दवाब बढे तो दूसरी तरफ़ कला की कद्र कम हुई | मजबूरी ने उन्हें वेश्यावृत्ति के दलद्ल मे ध्केल दिया | कुछ ने पेट भरने कि लिए दूसरे रास्ते खोज लिए और कुछ गुमनामी के अंधेरों में खो गईं | आज भी चौक, नक्खास, हुसैनाबाद,चौपटिया और ठाकुरगंज में कुछ गुमनाम आवाजें दम तोड रही हैं |
     अब फ़ूलवाली गली इतिहास में दर्ज होकर रह गई है | चावलवाली गली पर वेश्यावृत्ति का काला धब्बा लग चुका है | लेकिन वेश्यओं को यहां भी ठिकाना नहीं | उनके बसने व उजडने का सिलसिला बरसों से चल्र रहा है | आज लखनऊ और आसपास के जिलों के तमाम इक्के-तांगे वाले अपने को नवाबी खानदान से जुडा बताते हैं और कुछ समय के लिए ही सही उनका सिर गर्व से ऊपर उठ जाता है | लेकिन शायद ही कोई वेश्या अपने को मुजरेवाली बताने का साहस कर सके | इस स्थिति के लिए काफ़ी हद तक हमारी व्यवस्था भी जिम्मेदार रही है | राजे-रजवाडों को पेंशन दी गई | उन्हें बसाया गया लेकिन इन्हें किसी ने नही पूछा | यह तवायफ़ें सिर्फ़  इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गईं |

     

Wednesday, 26 November 2014

क्रिकेट से खिलवाड़

                
 ( L.S. Bisht ) क्रिकेट फिर कटघरे मे है । आइपीएल स्पाट फिक्सिंग मामले में उच्चतम न्यायालय ने श्रीनिवासन के दामाद मयप्पन की भूमिका किसी भेदिया जैसी बताई है । इसके अलावा मुदगल समिति की रिपोर्ट मे नामजद खिलाड़ियों के नाम उजागर करने की अपील पर भी सुनवाई की मंजूरी दे दी है । देखना है पिटारे से क्या निकलता है । कुछ निकलता भी है कि नहीं । लेकिन इतना तय है कि जो भी हो रहा है वह  इस खेल के हित में तो कतई नही है ।
देखा जाए तो क्रिकेट में पैसे और ग्लैमर के बढते प्रभाव ने इस खेल की नींव को खोखला करना शुरू कर दिया है | अब अस्सी या नब्बे के दशक का क्रिकेट नही रहा जब पैसे को नही खेल को महत्व दिया जाता रहा और खिलाडियों के लिए भी पैसा ही सबकुछ नही हुआ करता था |
आई पी एल ने जिस तरह से इस खेल को करोडों के खेल मे तब्दील कर दिया उसने इस खेल के स्वरूप को भी बहुत हद तक बदला  है | इसने खिलाडियों की सोच में देश भावना को नहीं बल्कि पैसे की भावना को जागृत करने का काम किया है | खिलाडियों का सारा ध्यान क्रिकेट के इस बाजार पर केन्द्रित होकर रह गया है | अब इनका एकमात्र मकसद इसमें अच्छा प्रदर्शन कर अधिक से अधिक रकम पर हाथ साफ़ करना है न कि क्रिकेट में देश का नाम ऊंचा करना | ग्लैमर व विज्ञापनों के तडके ने इस क्रिकेट सर्कस को और भी जायकेदार बना दिया है |
देखने वाली बात यह है कि खेल के इस संस्करण का मूल चरित्र ही ताबडतोड, बेफ़्रिक बल्लेबाजी है जिसमें तकनीक की कोई खास जरूरत भी नहीं | छ्क्के और चौकों की बरसात पैसे और विज्ञापनों की दुनिया का दरवाजा भी खोलती है और इस रंगीन दुनिया मे भला कौन नही आना चाहेगा | सही मायनों में खेल की इस शैली ने क्रिकेट की नींव को खोदने का काम बखूबी किया है | यह सोच पाना ज्यादा मुश्किल नही कि आई पी एल खेलने वाले यह धुरंधर टेस्ट मैच कितना अच्छा खेल पायेंगे जिसमे तकनीक, दमखम और धैर्य की असली परीक्षा होती है |
यहां गौरतलब यह भी है कि अब भारतीय टीम के चयन का आधार भी यही आई पी एल सर्कस बन गया है | यहां जिस खिलाडी ने धूम मचा दी उसका भारतीय टीम में भी चयन लगभग पक्का है | अभी हाल में भारतीय टीम मे जितने नये चेहरे शामिल किए गये हैं वह सभी इस जमीन से ही आये हैं | यह अब भारतीय क्रिकेट की जडों को खोखला करने लगा है टेस्ट संस्करण  तो भारी संकट मे  है | इस प्रारूप मे हमारी विश्व रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है |
कुछ समय पूर्व इस संबध मे इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइकल वान का कहना बिल्कुल सही लगता है कि भारत के युवा क्रिकेटरों को आई पी एल के दायरे से बाहर निकल कर काउंटी क्रिकेट खेलना चाहिए | उन्हें लीग की कशिश और बेशुमार कमाई के दायरे से बाहर निकलकर बाहर की बडी दुनिया से बाबस्ता होना पडेगा |
दूसरी तरफ़ इंग्लैंड के ही पूर्व कप्तान स्टीवर्ट ने बाहरी पिचों पर जब भारतीय बल्लेबाजी देखी तो तो जो बात कही वह  कहीं से गलत नही लगती कि फ़्लैचर भारतीय बल्लेबाजों के बदले बैटिंग नहीं कर सकते | वह अपना ज्ञान बांट सकते हैं | लेकिन बैट बैट्समैन पकडते हैं और मैदान पर उन्हें ही खेलना होता है | कोच खिलाडियों को तैयार करता है और उन्हें प्र्दर्शन करना होता है इसमें कोई संदेह नही कि यह स्थिति बनी रहेगी जब तक हम अपने गिरेबां मे झांकने का ईमानदार प्रयास नहीं करेंगे | हमें यह मानना ही पडेगा कि हमारे खिलाडियों के लिए पैसा, विज्ञापन और ग्लैमर देश के सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है | इन्हें इस संबध मे कडा संदेश देना ही होगा कि देश के सम्मान और भावनाओं से खिलवाड बर्दाश्त नहीं किया जायेगा |
       लेकिन जिस तरह से इस खेल मे पैसे का प्रभाव बढा है लगता नही कि भारतीय क्रिकेट का इससे कोई भला होगा बल्कि सट्टेबाजी और फिक्सिंग का ग्रहण इसे नीचे ही ले जायेगा । श्रीनिवासन जैसे लोग अपने फायदे के लिये इस खेल को पैसे के एक सर्कस मे बदल कर ऱख देंगे । अदालत के माध्यम से ही सही
इस खेल का और इसके अंदर की दुनिया का पूरा पोस्टमार्टम होना जरूरी है । अगर समय रहते य़ह न
किया गया तो देश मे न तो इस खेल की और न ही इसके खिलाडियों की कोई साख रह जायेगी । 
अब समय आ गया है कि खेल मे आ रही बुराइयों पर गंभीरता से  सोचा जाए | हमें यह भी समझना होगा  कि टीम के लिए खिलाडियों के चयन का आधार आई पी एल तो कतई नही हो सकता | इसके लिए एक निष्पक्ष नीति बनानी होगी जो सभी प्रकार के दबाबों से मुक्त हो | अगर ठोस कदमों की पहल न की गई तो भारतीय क्रिकेट अपनी ही बुराईयों के भार से अपनी चमक खो देगा |


Wednesday, 19 November 2014

आस्था और राजनीति का काकटेल


( एल.एस. बिष्ट ) सतलोक आश्रम में संत रामपाल की गिरफ्तारी को लेकर जो हुआ उसने एक बार फिर 1984 के आपरेशन ब्लू स्टार की याद दिला दी जिसमें भिंडरांवाले व उनके समर्थकों को मंदिर से बाहर निकालने के लिए तत्कालीन सरकार को पूरी ताकत झोंकनी पडी थी । आस्था और राजनीति के घालमेल का यह एक अकेला उदाहरण नहीं है । 6 दिसम्बर 1982 बाबरी मस्जिद विध्वंस को लोग अभी तक भूले नहीं हैं ।
आपरेशन ब्लू स्टार को लेकर सरकार ने जो श्वेत पत्र जारी किया था उसके अनुसार उसमें 83 सैनिक मारे गये थे और 249 घायल हुए थे । 493 चरम्पंथी या आम नागरिक भी मौत के शिकार बने । वहीं बाबरी मस्जिद घटना के बाद भडकी हिंसा में विशेष रूप से सूरत, अहमदाबाद, कानपुर व दिल्ली आदि शहरों मे 2000 से ज्यादा लोग मारे गये थे । इन दो बडी घटनाओं का गवाह रहा है हमारा लोकतंत्र । समय समय पर होने वाली छोटी बडी घटनाओं की तो एक लंबी फेहरिस्त है ।
इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में जायें तो धर्म-आस्था और राजनीति का घालमेल ही दिखाई देता है । हरियाणा मे संत रामपाल के आश्रम सतलोक मे हुई हिंसा इन्हीं घटनाओं की एक और कडी है । इस बात पर अभी तक संतोष किया जा सकता है कि इस घटना मे ज्यादा जानमाल का नुकसान नहीं हुआ है । लेकिन इसने भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी जरूर बजा दी है ।
दर-असल इधर कुछ वर्षों से राजनीति और धर्म व आस्था को लेकर जो विवाद व संघर्ष चलते रहे हैं, यह घटना उसकी दुखद परिणति ही है । बात चाहे साईं-शंकराचार्य विवाद की हो या लव जिहाद की या फिर संत रामपाल के भक्तों की , सभी की पृष्ठभूमि मे राजनीति की एक अहम भूमिका रही है और दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि आस्था के सवाल पर इन सामाजिक विवादों का राजनीति के घालमेल से एक खतरनाक चेहरा बनने लगा है ।
कहते हैं धर्म से बडी राजनीति कोई नहीं होती और राजनीति से बडा धर्म कुछ नहीं होता और शायद यही कारण है कि तमाम राजनीतिक दल धर्मगुरूओं की चौखट पर पहुंचते हैं और उनका समर्थन लेने की पुरजोर कोशिश करते हैं । अब तो उनके समर्थन व सहयोग के लिए धर्म ससंद जैसे आयोजन भी किए जाने लगे हैं । दर-असल धर्म और राजनीति का यह मिलन ही इन घटनाओं की पृष्ठभूमि को तैयार करता है । इससे ही जन्म लेती है धार्मिक व साम्प्रदायिक कट्टरता और धर्मगुरूओं दवारा भी राजनीति मे अपना रूतबा बनाने की चुहा दौड ।
इस संदर्भ में डा. राममनोहर लोहिया जी के विचारों को जानने व समझने का प्रयास करें तो आज के दौर की राजनीति मे उनके विचार कहीं ज्यादा प्रासंगिक लगते हैं । उन्होने कहा था " धर्म और राजनीति के दायरे अलग अलग हैं पर दोनों की जडें एक हैं । धर्म दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म है । धर्म का काम है अच्छाई करे और उसकी स्तुति करे । राजनीति का काम है बुराई से लडे और उसकी निंदा करे । जब धर्म अच्छाई न करे केवल स्तुति भर करता है तो वह निष्प्राण हो जाता है । और राजनीति जब बुराई से लडती नहीं, केवल निंदा भर करती है तो वह कलही हो जाती है । इसलिए आवश्यक है कि धर्म और राजनीति के मूल तत्व समझ मे आ जाए । धर्म और राजनीति का अविवेकी मिलन दोनो को भ्र्ष्ट कर देता है । फिर भी जरूरी है कि धर्म और राजनीति एक दूसरे से संपर्क न तोडें, मर्यादा निभाते रहें । "
लेकिन वोट बैंक की राजनीति ने इन मर्यादाओं को ताक पर रख कर जिस राजनीतिक शैली को जन्म दिया है यह घटनाएं उसी का परिणाम हैं । आज स्थिति यह है कि एक तरफ राजनेता अपने वोट बैंक के लिए धर्म और आस्था से जुडे धर्म गुरूओं की चौखट पर जाकर सजदा कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ यह धर्म गुरू भी राजनीतिक गलियारों मे अपना रूतबा कायम करने की कोशिश मे हैं । धर्म को राजनीति का संरक्षण और राजनीति दवारा धर्म का इस्तेमाल इन स्थितियों को जन्म दे रहा है । यह अल्पकालिक हित साधने की सोच देश के हित मे तो कतई नहीं है । अब अगर इस विकृति से समाज, राजनीति व देश को मुक्त रखना है तो धर्म - आस्था और राजनीति सभी को अपनी मर्यादाओं का निर्वाह करना ही होगा । इनका अविवेकी घालमेल पूरे सामाजिक व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर देगा ।





Sunday, 16 November 2014

हताशा और अवसाद का दंश झेलते बच्चे

    

( L.S. Bisht ) अभी हाल में हमने नेहरू जी को बडी शिद्दत से याद किया | नेहरू यानी जिन्हें उनकी राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा पंचशील, गुलाब और बच्चों के लिए जाना जाता है | लेकिन शायद उनकी विरासत की छीना-झपटी के चलते हम बच्चों की दुनिया को करीब से देखने और समझने का अवसर गंवा बैठे | सत्ता के गलियारों से निकले नारे, घोषणाएं और वादे जल्द ही राजनीति के गर्भ मे विलीन हो गये | लेकिन ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हुआ | देश का दुर्भाग्य रहा है कि इधर कुछ वर्षों से पूरे जनमानस का राजनीतिकरण बखूबी से हुआ है और मीडिया से लेकर आम आदमी तक की सोच मे राजनीति रच बस गई है | समाज से जुडे सवाल कहीं पीछे छूट गये हैं | राजनीति का नशा इतना गहरा है कि इन सवालों पर गंभीरता और गहराई से सोचने की जहमत कोई नहीं उठाना चाहता |
     जब पूरा देश अपने अपने तरीके से मासूम सपनों में रंग भरने की कवायद मे लगा था, लगभग उसी समय राजस्थान के एक स्कूल में एक बच्चे ने अपने अध्यापकों की प्रताडना से तंग आकर अपनी जिंदगी को अलविदा कह दिया | थोडी चर्चा हुई, शोर हुआ और फ़िर दूसरे ही दिन राजनीति की गरमा-गर्म खबरों की नई खेप ने उस खबर को हाशिए पर डाल दिया | किसी बच्चे की आत्महत्या की यह पहली खबर नहीं है | रोज ही देश के किसी न किसी कोने में कोई न कोई बच्चा इस तरह की प्रताडना का शिकार बनता है | लेकिन चंद दिनों बाद सबकुछ भुला दिया जाता है |
     अगर हम राजनीतिक खबरों की दुनिया से बाहर निकल थोडा गौर करें तो पता चलता है कि 2012 के सुस्त सरकारी आंकडों में 14 वर्ष तक की उम्र में कुल 2738 बच्चों ने आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला समाप्त की | इसमें 1353 लडकियां और 1385 लडके सम्मलित हैं | इतनी आत्म्हत्याओं का कोई न कोई कारण होना भी स्वाभाविक है | ज्ञात कारणों पर नजर डाले तो पारिवारिक कारणों से कुल 354 व परीक्षा मे असफ़ल हो जाने के कारण 226 बच्चों ने मृत्य को गले लगाया | यहां गौरत्लब यह भी है कि 560 बाल आत्महत्याओं मे कोई कारण ज्ञात न हो सका यानी इन बच्चों ने आत्महत्य जैसा कदम क्यों उठाया, कभी पता न चल सका |
     दर-असल यही वह मौतें हैं जिनमें या तो स्कूल बच्चे के परिसर की दुनिया जिम्मेदार है या फ़िर स्वंय बच्चे के घर के अंदर का दमघोटू माहौल जहां उससे उसकी उम्र से कहीं ज्यादा की अपेक्षाएं की जाती रही हैं | स्कूल व पारिवारिक परिवेश से जुडी यह आत्महत्याएं ही अज्ञात कारणों के अंधेरों में धकेल दी जाती हैं और फ़िर इन पर क्भी कोई बहस नहीं होती |
     दर-असल विकास की सीढीयां चढ्ते हुए इस देश मे महत्वाकाक्षाओं की उडानों का ऐसा विस्तार भी हुआ है जिसके दुष्परिणामों का दंश बच्चे भुगतने के लिए मानो अभिशप्त हैं | अभिभावकों की जीवन में ऊचे पायदान मे खडे होने की लालसा उनके ही बच्चों के बचपन को डसने लगी है, इससे वह बेखबर हैं | वह नहीं जान पा रहे हैं कि अपने बच्चों से किसी भी कीमत पर उपलब्धियों की अपेक्षाएं उन्हें हताशा और अवसाद के अंधेरों की तरफ़ खींच रही हैं | असमय मृत्यु का ग्रास बनते बच्चों के बचपन का यह एक बहुत बडा कारण है |
     एक तरफ़ माता पिता की आकाश छूती महत्वाकाक्षाएं और सपने हैं जिनका दवाब यह बच्चे पूरी खामोशी से येन केन झेल रहे हैं तो दूसरी तरफ़ स्कूली अनुशासन व स्टेट्स का पाखंड जहां उन्हें ख्र्रा उतरना है | पढाई संबधित थोडी सी चूक अध्यापकों के व्यवहार को इस सीमा तक अमानवीय बना देती है कि बच्चा भय और अवसाद के गहरे समुद्र में डूबने उतराने लगता है | प्र्ताडना और मानसिक दवाब जब सारी सीमाएं लाघं जाता है तो वह एक दिन वह कर बैठ्ता है जो दूसरे दिन के अखबार की सुर्खियां बनता है | और फ़िर चंद समय के लिए संवेदनाओं की लहर पैदा कर अनुत्तरित सवाल पीछा छोड जाता है | इस तरह यह सिलसिला जारी रहता है | समाज व शासन की संवेदना इतनी सतही होती है कि भविष्य मे होने वाली इन आत्महत्याओं को नही रोक पाती |
     यहां गौरतलब यह भी है कि माता-पिता की आकाश छूती महत्वाकाक्षाओं तथा आधुनिक स्कूल संस्कृति के दोहरे दवाब के अलावा भी उसकी जिंदगी मे बदले सामाजिक परिवेश ने कई और दुखों का इजाफ़ा किया है | नैतिक मूल्यों की गिरावट से जहां एक तरफ़ उसकी मासूम दुनिया मे यौन शोषण का गहराता अंधेरा है तो वहीं दूसरी तरफ़ आर्थिक उन्नति की दौड ने लाखों नौनिहालों के बचपन को कारखानों, ढाबों और फ़ुटपाथों पर गिरवी रख दिया है | यानी उसकी मासूम दुनिया के चहुं ओर खतरों का घेरा क्सता जा रहा है |
     लेकिन इन सबके बाबजूद दुखद तो यह है कि इन खतरों की गंभीरता को अभी समझा जाना शेष है | घट्ना विशेष के संदर्भ में टुकडों में मह्सूस की जाने वाली संवेदना से कोई विशेष हित नही होने वाला | ह्में पूरी शिद्द्त से बच्चों की दुनिया के दुखों और खतरों को स्मझना होगा और उन सभी रास्तों को बंद करना होगा जो उसे अंधेरे की तरफ़ बरबस खींच ले जाते हैं |


Wednesday, 12 November 2014

टी.वी. पत्रकारिता का यह कैसा चेहरा है


पत्रकारिता चाहे वह प्रिंट मीडिया की हो या फिर टी.वी. न्यूज चैनल की, उसका यह नैतिक दायित्व है कि वह समाज से जुडी खबरों को संतुलित तरीके से पेश करे तथा सच को सामने लाने का प्रयास करे । लेकिन इधर कुछ समय से न्यूज चैनल पत्रकारिता का एक अलग ही चेहरा सामने आया है । जिसे देख कर ऐसा तो कतई नहीं लगता कि इन्हें सकारात्मक जनमत बनाने के अपने नैतिक दायित्व का तनिक भी बोध है ।
महिलाओं से जुडे मुद्दों पर जिस तरह की पत्रकारिता कुछ चैनलों मे की जा रही है उसे देख कर तो लगता है कि इनका मुख्य उद्देश्य या तो अपनी टी.आर.पी. बढाना है या फिर हवा के साथ बहते हुए वाही वाही बटोरनी है । 11 नवम्बर को एक न्यूज चैनल ने अपने कार्यक्रम में जिस तरह से एक साधारण खबर का तिल का ताड बनाया उसने सोचने को मजबूर कर दिया कि आखिर यह कैसी टी.वी.पत्रकारिता है ।
महिला संबधी खबरों का पक्षधर होना गलत नहीं लेकिन अर्थ का अनर्थ निकाल कर अपने को पक्षधर साबित करना कहीं से भी उचित प्रतीत नहीं होता । अपनी खबर मे उस प्रतिष्ठित चैनल ने बताया कि जम्मू-कश्मीर के चुनावों के लिए भरे जाने वाले नामांकन में एक विधायक ने ' लाइबिलीटी ' कालम मे अपनी दो अविवाहित बेटियों के होने का उल्लेख किया है । खबरों मे इस बात की निंदा की गई यह कहते हुए कि विधायक अपनी बेटियों को अपने लिए भार समझते हैं । ऐसा लिखना महिलाओं का अपमान है । यानी उन्हें महिला विरोधी करार दे दिया गया ।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि उन विधायक ने लाइबिलीटी के कालम मे यह लिख कर कोई गलती नही की थी । दर-असल इस शब्द का शाब्दिक अर्थ है ' जिम्मेदारियां ' । यहां समझने वाली बात यह है कि एक पिता के लिए अपनी दो बेटियों का विवाह करवाना क्या एक जिम्मेदारी नही है । उनके लिए उचित वर की तलाश करना और फिर विवाह समारोह का खर्च पिता की जिम्मेदारी नही तो किसकी क्या है । यही नही सरकारी कागजों मे सरकारी कर्मचारी ' लाइबिलीटी ' के कालम मे ऐसा लिखते हैं । विशेष रूप से किसी कर्मचारी की सेवाकाल मे होने वाली मृत्यु पर उसके आश्रितों को निर्धारित प्रपत्र पर इस सूचना का भी उल्लेख करना होता है कि मृत्यु समय मरने वाले की लाइबिलीटी कितनी थी । यही नही, आम बोलचाल की भाषा मे रिटायर्मेंट के समय बहुधा यह कहा जाता है कि " अभी एक बेटी की शादी की लाइबिलीटी बची है और बेटे को भी कहीं सेटल करना है " । ऐसे मे विधायक का कथन किस नजरिये से गलत हो गया ।
ऐसा पहली बार नहीं । अक्सर महिलाओं से जुडी खबरों को इसी अंदाज मे परोसा जाने लगा है । बात का बतगंढ कर बना कर अपने को महिलाओं का हितैषी बताने की पुरजोर कोशिश की जाती है । सामाजिक जीवन की छोटी छोटी खबरों को भी महिलाओं के सम्मान और अस्मिता से जोड कर प्रचारित करना एक चलन या फैश्न सा बना दिया गया है । ऐसे मे खबरों का इस तरह से प्रस्तुतीकरण एक वर्ग के लिए नकारात्मक परिवेश की जमीन भी तैयार करता है । लेकिन अपने को महिला पक्षधर साबित करने का नशा कुछ इस कदर हावी है कि इसके साइड इफेक्ट दिखाई नही दे रहे ।

एक सीमा से अधिक अंध भक्ति से महिलाओं का हित नही अपितु अहित ही होगा । अभी हाल मे दिल्ली और कुछ दूसरे स्थानों पर " किस आफ लव " जैसे अश्लील प्रदर्शनों ने यह साबित भी कर दिया है । पत्रकारिता का तो यह पहला दायित्व है कि खबरों को संतुलित तरीके से पेश किया जाए न कि सनसनीखेज बना कर, जैसा कि किया जा रहा है ।खबरों की दुनिया में यह चुहा दौड कब रूकेगी, पता नहीं । 

Sunday, 9 November 2014

देह व्यापार को कानूनी वैधता का सवाल

( L. S. Bisht ) भारत मेँ देह व्यापार को एक कानूनी दर्जा देने का मुद्दा उस जिन्न के समान है जो वैसे तो बोतल मे ही बंद रहता है लेकिन यदा कदा ढ्क्कन खोल कर उसे निकालने की कमजोर कोशिश मेँ फिर बंद कर दिया जाता है । उच्चतम न्यायालय मेँ यह मामला एक बार चर्चा मे है । दर-असल 2010 में एक जनहित याचिका में देह व्यापार से जुडी महिलाओँ के पुनर्वास की व्यवस्था करने की मांग उठाई गई थी । इसी सिलसिले में एक पैनल का गठन किया गया है जिसे उन सभी बिंदुओं पर विचार करना है जिनसे वेश्याएं एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें ।
देह व्यापार के दलदल में फंसी सेक्स वर्कर के काम को भी कानूनी दर्जा दिए जाने की वकालत महिला आयोग की अध्यक्षा ने एक प्रस्ताव मे किया है जिस पर गठित पैनल को विचार करना है । लेकिन जैसी की उम्मीद थी इस प्रस्ताव के विरोध में खडे होने वाले झंडाबरदारों की भी कमी नहीं है । लेकिन दूसरी तरफ इस घृणित व्यवसाय से जुडी वेश्याएं एक स्वर से यह मांग उठाती रही हैं कि उनके काम को भी वैधता प्रदान कर एक व्यवसाय के रूप मे देखा जाए ।
जनवरी में कोलकता मे आयोजित सम्मेलन में देशभर की सेक्स वर्कर ने घृणित समझे जाने वाले अपने इस काम की तमाम समस्याओं की तरफ लोगों का ध्यान खींचा था और सरकार से इसे कानूनी मान्यता देने की पुरजोर वकालत की थी । उनका मानना है कि दूसरे अन्य व्यवसायों से जुडे कामगारों की तरह उन्हें भी सरकार कुछ सुविधाएं उपलब्ध कराए ।
बहरहाल यह तो समय बताऐगा कि सेक्स वर्कर के सबंध में क्या कुछ किया जा सकेगा लेकिन इतना तय है कि भारत जैसे देश में इस मुद्दे पर उदार फैसले का मतलब मधुमक्खियों के छ्त्ते को छेडने के समान है । दर-असल इस मामले मे भारतीय समाज में एक पाखंडपूर्ण व्यवहार दिखाई देता है । जो एक तरफ तो पश्चिमी संस्कृति की न सिर्फ वकालत करता है अपितु उसे नि:संकोच अपनाने मे भी कोई गुरेज नहीं । वह सामाजिक जीवन में खुलेपन के पक्ष में खडा दिखाई देता है जहां पहनावे से लेकर व्यवहार तक मे किसी भी तरह का बधंन उसे रूढिवादी सोच का परिचायक लगता है । उसे माल संस्कृति से लेकर फैशन शो और इंटननेट पर खुली छूट आधुनिकता के मापदंड प्रतीत होते हैं । लेकिन सेक्स के मामले में उसकी सोच को लकवा मार जाता है और वह उस पर परदेदारी के पक्ष में ही खडा दिखाई देता है ।
आधुनिक होते समाज मे वह आज भी यह मानने को तैयार नहीं कि सेक्स इंसान की उतनी ही बडी जरूरत है जितना कि उसके लिए भोजन और पानी । यहां पर उसकी सोच विवाह से शुरू होकर वहीं पर खत्म हो जाती है । इसके अलग सोचने को वह कतई तैयार नहीं । आज जबकि जिंदगी कहीं ज्यादा जटिल हो गई है और जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति विवाह बधंन से जुडी जिम्मेदारियों को वहन करने मे सक्षम हो तो क्या सेक्स उसकी जरूरत का हिस्सा नहीं बनती ? ऐसे मे कहीं कोई विकल्प तो तलाशना ही होगा ।
भारतीय समाज व आज की जीवन शैली पर थोडा गौर करें तो हम देखेंगे कि हमारे बडे महानगर दिल्ली, मुबंई व कोलकता ही नहीं कई और शहर भी रोजी रोटी के लिए लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और इन शहरों मे लाखों लोग छोटे-बडे कामों की तलाश में अपने परिवार व गांव-कस्बों को छोड आने को मजबूर दिखाई देते हैं । यह शहर उन्हें रोटी तो देता है और सडक किनारे एक झुग्गी बसाने की मोहलत भी लेकिन आर्थिक रूप से इतना सामर्थ्यवान नहीं बनाता कि वह बार बार मीलों दूर अपनी पत्नी के पास जा सके । ऐसे मे किसी विकल्प के अभाव मे उसके अपने ही आसपास या तो अवैध सबंध बनते हैं या फिर सभंव है वह् बलात्कार जैसा घिनोना काम कर बैठे ।
यहां गौरतलब यह भी है कि हमारा समाज एक तरफ ऐसे अवैध सबंधों व बलात्कार जैसे कृत्यों की तो आलोचना भी करता है और वहीं दूसरी तरफ इस मामले में किसी प्रकार की आजादी के पक्ष मे खडा होता भी नहीं दिखाई देता । यहां उसे सारी सामाजिक व्यवस्था ही छिन्न भिन्न नजर आने लगती है
लेकिन दुनिया का सबसे पुराना व्यवसाय समझा जाने वाला यह देह व्यापार इस पाखंडपूर्ण सोच के बाबजूद बखूबी फल फूल रहा है । परंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कानूनी वैधता के अभाव में लाखों सेक्स वर्कर एक तिरस्कारपूर्ण, उपेक्षित व घिनौनी जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं । सारे कानून उन्हें ही कटघरे मे खडा करते दिखाई देते हैं । वह न तो अपने वर्तमान से सतुष्ट है और न ही भविष्य के प्रति आशावान । घिनौनी, उपेक्षित व तिरस्कृत जिंदगी के कुचक्र मे फंसी इन सेक्स वर्करों को क्या सम्मानजनक जिंदगी जीने का अधिकार नहीं ? क्यों नहीं इनके काम को भी एक काम मान कर वह सभी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं जो दूसरे व्यवसायों से जुडे कामगारों को मिलती हैं

आज तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश मे यह जरूरी हो जाता है कि देह व्यापार को कानूनी वैधता प्रदान कर सेक्स वर्करों को भी सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार दिया जाए और यह तभी संभव है जब हम तमाम पूर्वाग्रहों व संस्कारगत हठधर्मिता से हट कर सेक्स को इंसान की एक अहम जरूरत के रूप में स्वीकार करें । 

Thursday, 6 November 2014

केजरीवाल का भविष्य तय करेगा यह चुनाव


(L.S. Bisht ) दिल्ली में चुनाव का बिगुल बज उठा है । इसके साथ ही दिल्ली को फिर इंतजार है एक अदद सरकार की जो देश की राजधानी को संभाल सके । लेकिन सरकार बनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है इस चुनाव मे प्रतिष्ठा का सवाल । भारतीय जनता पार्टी तमाम दावों के बाबजूद बहुमत हासिल करने में असफल रही थी । वहीं चमत्कारिक ढंग से वजूद में आई आम आदमी पार्टी ने पूरी राजनीति की तस्वीर ही बदल दी थी और 28 सीटें जीत दूसरे नम्बर की पार्टी होने का तमगा हासिल कर चर्चा का विषय बनी । देश की सबसे बडी और पुरानी पार्टी होने का दम भरने वाली कांग्रेस चारों खाने चित्त गिर कर बेदम सी दिखने लगी थी । लेकिन चमत्कार और राजनीतिक दांव-पेंचों के बीच अंतत: दिल्ली 49 दिन बाद फिर वहीं खडी होने को अभिशप्त हो गई जहां से चली थी ।

अब यह चुनाव एक तरफ भाजपा व मोदी जी के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी व केजरीवाल को यह साबित करना है कि दिल्ली का मतदाता आज भी उसके साथ खडा है । उन्हें इन राजनीतिक अटकलों को भी गलत सिध्द करना है कि जनता का उनसे मोह भंग हो गया है और दिल्ली की गद्दी छोडना उनकी एक राजनीतिक भूल थी । वैसे यह तो समय ही बतायेगा कि दिल्ली किस पाले मे खडी होती है लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति का अंदाज साफ संकेत दे रहा है कि यह चुनाव महज एक सरकार बनाने के लिए नहीं अपितु उससे कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है ।

दर-असल दिल्ली का चुनाव इस मायने मे  खास है कि यहां आम आदमी पार्टी है जिसने अपनी चुनावी राजनीति के आगाज में ही चमत्कारिक ढंग से दूसरे बडे दलों को पीछे छोड दिया था । केजरीवाल एक धूमकेतू की तरह दिल्ली मे ही नहीं राष्ट्रीय  राजनीति के  क्षितिज पर भी एक जन नायक के रूप मे उभर कर सामने आए थे । अपनी नई राजनीतिक व कार्य संस्कृति के बल पर जिस तरह आप पार्टी ने राजनीति मे आगाज किया, उसने बडे बडे राजनीतिक पंडितों को भी हैरत मे डाल दिया था ।

यह कम आश्चर्यजनक नहीं कि अपने पहले ही चुनाव मे इस नई नवेली पार्टी ने दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों मे से 28 में विजय हासिल की । यही नहीं 29.49 प्रतिशत वोट प्राप्त कर अपनी लोकप्रियता भी सिध्द की । जब कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी सिर्फ 8 सीटें जीत कर 24.55 प्रतिशत वोट ही पा सकी थी । ऐसे मे केजरीवाल जी के झाडू का व्यवस्था विरोध का प्रतीक बन जाना स्वाभाविक ही था । लेकिन समय चक्र कुछ ऐसा घूमा कि तमाम राजनीतिक प्रपंच व दांव पेंचों के बीच केजरीवाल मुख्यमंत्री बने लेकिन फिर 49 दिन बाद जन लोक्पाल बिल के सवाल पर त्याग पत्र देकर सत्ता से बाहर हो गये और दिल्ली ठगी सी रह गई ।

इसके बाद लोकसभा चुनाव मे तमाम उम्मीदों के विपरीत केजरीवाल पूरी तरह फ्लाप साबित हुए और बनारस में ताल ठोंक कर चारों खाने चित्त गिरे । अन्य राज्यों में भी उनका और पार्टी का प्रभाव नगण्य ही रहा । ऐसे मे राजनीतिक पंडितों ने उन्हें सिरे से खारिज कर दिया । दूसरी तरफ मोदी जी और भाजपा ने चुनावी इतिहास का एक नया अध्याय लिखा । इसके बाद होने वाले महाराष्ट्र व हरियाणा के चुनावों में भी जीत हासिल कर अपने ' जादू ' को बरकरार  रखा । राजनीतिक पंडितों की भाषा में इसे ' मोदी जादू ' व ' मोदी लहर ' का नाम दिया गया ।

अब यह चुनाव मोदी, मोदी सरकार और भाजपा के लिए भी एक प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है । भाजपा को साबित करना है कि आप पार्टी की लोकप्रियता महज कांग्रेसी कुशासन का नतीजा थी और केजरीवाल का जन-नायक बनना महज एक संयोग । दूसरी तरफ आप पार्टी व केजरीवाल जी को साबित करना है कि कम से कम दिल्ली आज भी उनकी है । यहां मोदी लहर या मोदी जादू की कोई भूमिका नही ।

यह चुनाव भाजपा के विजय रथ के आगे बढने या रूकने से ज्यादा केजरीवाल जी के लिए महत्वपूर्ण है । अगर इन चुनावों मे केजरीवाल व उनकी  पार्टी पिछ्ले प्रदर्शन को न दोहरा सकी तो बहुत संभव है कि उनका राजनीतिक भविष्य ही खतरे में पड जाए । केजरीवाल तो स्वयं हाशिए पर चले ही जायेंगे साथ में बहुत संभव है कि पार्टी बिखराव का शिकार बन अपने वजूद को ही खत्म कर दे । यानी एक तरह से यह चुनाव केजरीवाल व उनकी पार्टी के लिए महज एक चुनाव ही नही अपितु जीवन व मरण का सवाल भी बन गया है । अब देखिए होता है क्या ।   

Tuesday, 4 November 2014

केनी, तुम्हें क्या कहूं

                                               
( L.S. Bisht ) आज वह फिर उदास है । वैसे उसके चेहरे में गहरी उदासी की रेखायें देखने का मैं एक तरह से अभ्यस्त सा हो गया हूं । मुझे पता है कि उसकी जिंदगी में बसंत अब एक गुजरे दौर की याद भर रह गया है । अब अगर कुछ शेष है तो रेगिस्तान की मानिंद खामोशी जिसे उसने स्वीकार कर लिया है ।

अस्सी के दशक की केनी यानी कनुप्रिया अब कहीं खो सी गई है । लखनऊ विश्वविधालय में बिताए खूबसूरत दिनों की यादों को संजोये रखने की भी उसे कोई वजह नजर् नहीं आती । हां कुछ साहित्यिक  किताबें जिन्हें वह अक्सर हम दोस्तों से साझा किया करती थी एक कोने में धूल खा रही हैं । बीच में दो मोटी किताबें वुडवर्थ की लिखी मनोविज्ञान  विषय पर जिन्हें मैं अक्सर उससे उधार मांगा करता था अभी सही सलामत हैं । बस यही कुछ् निशानियां हैं उसके पास उस बीते दौर की जिसे वह बहुत पीछे छोड चुकी है ।

चंचल हिरनी की तरह विश्वविधालय के मनोविज्ञान ब्लाग् में कुंलाचे भरने वाली केनी अब बेदम, बेबस सी , झील के ठहरे हुए पानी की तरह बस मुझे टुकर टुकर देखती भर है । बहुत कम बोलती है । उसके पास अब शायद ही कोई आता हो । उसने अपने आपको उदासी की गहरी परतों में कैद जो कर लिया है । लेकिन मेरा आना जरूर उसे सुकून सा देता है । शायद इसलिए भी कि मैं एक्मात्र गवाह हूं उसकी उस स्वप्निल दुनिया का, सुहानी शामों और चांदनी रातों का जो कभी उसने नीरज के साथ गुजारे । सबकुछ एक फिल्म की तरह आंखों में तैरने लगता है ।

लेकिन उसके सपनों के उस राजकुमार के लिए तो प्यार मात्र एक खिलवाड था । प्यार में अपना सबकुछ न्योछावर कर देने वाली केनी की जिंदगी से विवाह के पांच साल बाद नीरज का  यूं चले जाना, उस दौर के हम दोस्तों के लिए एक आघात से कम नहीं रहा ।

परिवार से संबध प्यार के चलते पहले ही छिन्न भिन्न हो चुके थे । समय की गति ने बाकी बचे रिश्तों को भी अपने आगोश मे ले लिया । वह दुनिया में निपट अकेली रह गई और तब तक उन दिनों के दोस्त भी इधर उधर बिखर गये । नौकरी जीने का सहारा बन गई लेकिन यादों के टीसते नासूर को भुला उसने जिंदगी मे दोबारा रंग भरने की कोशिश कभी नहीं की । अपनी उदासियों और छ्ले जाने के संताप के बीच, पहाड सी जिंदगी मे अब वह एक प्रौढ महिला में तब्दील हो चुकी है ।

अब मेरा उसके पास जाना भी बहुत कम हो पाता है । सोचता हूं आखिर उसके सपनों और प्यार की यह अकाल मौत क्यों हुई । एक दोस्त के रूप में उन दिनों  नीरज हमें कभी बुरा क्यों नही लगा । लेकिन आखिर उसने ऐसा क्यों किया । एक छ्लावे भरे प्यार के लिए अपनी पूरी जिंदगी को होम कर देने वाली इस मित्र केनी को क्या कहूं ।जहां एक तरफ महिलाओं के भावनात्मक व शारीरिक शोषण को लेकर बडे बडे कानूनों व बातों की हवा बह रही हो वहीं अपने को अपने ही जीवन मूल्यों पर होम कर देना एक सवाल तो उठाता ही है कि आखिर तमाम विद्रोही स्वरों के बीच यह कैसी सोच है । यह भी संभव है कि  शायद प्यार की दुनिया है ही ऐसी कुछ चीजें कभी समझ नहीं आतीं । 

Saturday, 1 November 2014

लुप्तप्राय: सांस्कृतिक याद – रंग-बंग


( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र की वादियों में बसे गांव सदियों से अपने में बहुत कुछ समेटे हुए हैं | एक अलग सस्कृति, लोकजीवन की अपनी लय और सपनों की अपनी विरासत | यह सांस्कृतिक विरासत अब समय के थपेडों के साथ बहुत कुछ बदलने लगी है | काफ़ी कुछ बिसरता जा रहा है | कभी यहां की घाटियां अपने इन्द्रधनुषी लोकजीवन के लिए कौतुहल का विषय हुआ करती थीं | बहुत कुछ आज भी जानना-समझना शेष है |
     आकाश छूती पर्वतश्रंखलाओं के बीच इस अंचल की ऐसी ही दो घाटियां हैं – दारमा और जोहार | यहां के लोकजीवन में बहती सांस्कृतिक धारा की अपनी लय है जिसंमें बहुत कुछ अनूठा है | इन घाटियों के वाशिंदे मूल रूप से मंगोल नस्ल के हैं तथा चेहरे तिब्बती जैसे | वैसे भी तिब्बत सीमा से जुडे रहने के कारण इनका तिब्बत से व्यापारिक संबधों का एक पुराना इतिहास है | इन्हीं सीमावर्ती लोगों को अब हम आमतौर पर ‘ भोटिया नाम से जानते हैं |
     इस समुदाय के बारे में बहुत सी बातें चर्चा मे रही हैं |यहां की महिलाओं के सौंदर्य की कहानियां तो दूर दूर तक लोगों के कौतुहल का विषय बनी हैं | अनेक कहानी-किस्सों के बीच यह भी कहा जाता है कि कभी इतिहास में यहां की एक बेहद सुंदर युवती राजुला के रूप सौंदर्य का जादू दवाराहाट के एक राजकुमार पर ऐसा छाया कि वह अपना राजपाट छोड उसके गांव आ पहुंचा और अंतत: उसे अपने साथ ले जाकर ही दम लिया |
     लेकिन यह सीमावर्ती घाटियां महज इन परिणय लोककथाओं की ही गवाह नहीं हैं अपितु एक अनोखी परंपरा भी यहां सालों साल परवान चढती रही है | युवाओं को प्रेम व काम सुख का प्रथम एहसास दिलाने की एक प्राचीन परंपरा यहां रही है और जहां किशोर-किशोरियां का पहली बार मिलन होता था उसे रंगबंग गृह के नाम से जाना जाता था | यह गांव का एक सामुहिक घर होता था जिसे गांव के लोगों दवारा ही बनवाया जाता था |
     प्रथम प्रेम के उन्मुक्त व्यवहार से जुडे इस ‘ रंग-बंग ‘ नामक गृह में आने का निमत्रंण भी गांव की किशोरियां अपने तरीके से देती थीं | बहुधा किसी ऊंचे स्थान से सफ़ेद रूमाल हिला कर युवतियां दूसरे गांव के युवकों को रंग-बंग में आने का संदेश पहुंचाया करती थीं | सूरज डूबने के साथ युवाओं की टोलियां नाचते गाते पहुंच जाया करतीं और फ़िर शुरू होती लडके लड्कियों के बीच गीत प्रतियोगिता | इसमें स्थानीय लोकगीतों का भी भरपूर इस्तेमाल होता |
     इनके नृत्य और गीतों से पूरे वातावरण में प्रेम रस घुल सा जाता और फ़िर अपने पसंद के साथी को चुन पहुंच जाते ‘ रंग-बंग ‘ के भीतर , उस दुनिया में जहां उन्मुक्त प्रेमरस में डूब बुनने लगते अपने भविष्य के सुनहले सपनें | बाद मे परिवार के बडे बुजुर्ग बातचीत कर विवाह का दिन निश्चित कर लिया करते |
     इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्र्मों का आयोजन किया जाता था | युवतियां मदिरा पान करवातीं और फ़िर मस्ती में डूब सभी जोडे संगीत और नृत्य की लय में झूमने लगते | इस अवसर पर प्रणय गीतों का समां बंध जाया करता |
     प्राचीन पुस्तकों में इस अवसर पर किये जाने वाले अनेक भोटिया नृत्यों का भी उल्लेख मिलता है | चम्फ़ोली, इडियाना तथा घुरंग आदि प्रमुख नृत्य थे | यह सभी धीमी गति के नृत्य थे जिन्हें गोलाकार रूप में किया जाता था |
     यहां युवक-युवतियों को एक तरफ़ पूरी स्वतंत्रता रहती तो दूसरी तरफ़ कुछ कानून कायदों का भी पालन करना पडता था | रंग-बंग की गतिविधियों का संचाल्न उस प्रौढा द्वारा किया जाता था जो या तो आजन्म कुंवारी रही हो अथवा जिसने गृहस्थ जीवन त्याग दिया हो | यह संचालिका कुछ विशेष सामाजिक नियमों के तहत ही मिलने का अवसर देती और फ़िर उनके विवाह रस्म की तैयारियां भी शुरू हो जाया करतीं | लडकी के घरवाले बारातियों का स्वागत करते तथा भोजन की व्यवस्था भी करते |
     इस व्यव्स्था से दाम्पत्य सूत्र में बंधने वाले युगल यदि किन्हीं कारणों से बाद में अलग होना चाहते तो इसके लिए उन्हें पूरी स्वतंत्रता रहती | बहरहाल अब ‘ रंग-बंग ‘ की यह परंपरा लगभग लुप्तप्राय: ही है | दर-असल समय के साथ लोगों ने इस प्रथा को उपयोगी नहीं समझा | शिक्षा के प्रसार ने भी लोगों का नजरिया काफ़ी बदला है | लेकिन क्भी कधार सुदूर गांवों मे “ रंग-बंग” यानी युवागृह के भवन देखने मात्र से ही लोगों को पुराने दिन याद आने लगते हैं |




Friday, 24 October 2014

हिमालय क्षेत्र के जंगलों से लुप्त होती जडी-बूटियां

           

( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र आदिकाल से अपने प्राकृतिक संसाधनों की द्र्ष्टि से समृध्द रहा है | यहां के वन और पहाड तमाम खनिजों व बहूमूल्य लकडियों के लिए तो जाने ही जाते हैं इसके साथ ही दुर्लभ जडी-बूटियों का भी भंडार यही हिमालय क्षेत्र है | परन्तु सरकार की उदासीनता तथा किसी योजना के अभाव में जडी-बूटियों के इस भंडार का यथोचित उपयोग नही हो पाया है और न ही स्थानीय लोगों को कोई विशेष लाभ पहुंचा है |
     इधर कुछ वर्षों से प्राकृतिक द्र्ष्टि से संपन्न इस हिमालय क्षेत्र का चौतरफ़ा शोषण हुआ है | वनों के निर्मम दोहन से लेकर खनिज दोहन तक की लंबी कहानी है |
     इस शोषण के विरूध्द जाग्रत चेतना का प्रतीक रहे हैं चिपको आन्दोलन व दून घाटी से उपजी पर्यावरण की संगठित लडाई , जिसका अपना एक इतिहास रहा है | आज उत्तराखंड के नंगे पहाड और चूना खदानों से आहत हुई दून घाटी के अलावा जहां तहां खनिज दोहन के फ़लस्वरूप घायल पडी पहाडियां इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं |
     बात सिर्फ़ यहीं तक सीमित नही रही | अभी उत्तराखंड के खामोश पहाड इस त्रासदी से उबर भी न सके थे कि सरकारी तंत्र की मिली भगत व वन विभाग की लापरवाही के फ़लस्वरूप पहाड के वनों से जडी-बूटियों की तस्करी भी होने लगी | इसका दुखद पहलू यह भी रहा कि काफ़ी समय तक इस संपदा के महत्व और उपयोगिता पर किसी का ध्यान गया ही नही | यह ऐसे ही चलता रहा |
     इस प्रवृत्ति के फ़लस्वरूप आज पहाड के वनों में अनेक चिकित्सोपयोगी जडी-बूटियों का अस्तित्व ही संकट में पड गया है | यही नही, बहूमूल्य औषधियों की खोज में कई दुर्लभ किस्म की वनस्पतियों को भी नष्ट किया जा रहा है |
     दुर्भाग्यपूर्ण पहलू तो यह है कि कई बार अवैध चोरी के ऐसे मामले पकडे भी जाते रहे हैं लेकिन सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार के कारण कुछ नही हो पाता | आज भी उत्तराखंड के सुदूर जंगलों से जडी-बूटियों की चोरी बदस्तूर जारी है | इसके चलते तस्कर, ठेकेदार व शहरों के कुछ आयुर्वेदिक दवा कंपनियों के मालिक अपनी जेबें भर रहे हैं |
     यहां के अनेक स्थलों पर औषधियों का अथाह भंडार है | तुंगनाथ, मलारी, पवाली, बिनसर, डांडा क्षेत्र, द्रोणागिरी पर्वतमाला, टोंस घाटी क्षेत्र व मुन्स्यारी, नंदकोट आदि स्थानों पर अनेक दुर्लभ व बहूमूल्य जडी-बूटियां मिलती हैं | इसके अतिरिक्त तमाम रोगों में लाभकारी पहाडी फ़ल जैसे काफ़ल, किंगोड, हरड, रीठा, बेडू, हिसर तो लगभग पूरे उत्तराखंड में मिलते हैं | लेकिन आज यहां से इनका अवैध व्यापार हो रहा है | यही चीजे मैदानी शहरों मे कई गुना दामों पर बेची जा रही हैं |
     लाइलाज समझी जाने वाली अनेक बीमारियों में काम आने वाली जडी-बूटियों की इस क्षेत्र मे भरमार है | दमा, गठिया व उदरशूल के लिए तो यहां अनेक प्रभावकारी औषधि पौधे बहुतायत मे मौजूद हैं | सर्पदंश व अन्य किसी भी तरह के विष मे काम आने वाली औषधियां भी इस हिमालय क्षेत्र में मिलती हैं | परन्तु यहां के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जो शोषण की प्रवत्ति पनपी है उससे इन जडी-बूटियों का अस्तित्व ही खतरे में पड गया है |
     कभी मंदाकनी घाटी मे सर्पगंधा व मृत संजीवनी बहुतायत में मिलती थी लेकिन आज बहुत तलाशने पर ही इनके दर्शन होते हैं | इसी तरह ब्रहमकुमारी, इसरमूल, वसींगा तथ अपराजिता आदि औषधियां भी संकट के दौर से गुजर रही हैं| शक्तिवर्धक कई औषधियां तो अब लुप्त होने की कगार में हैं | इन जडी-बूटियों का महत्व इस बात से ही पता चल जाता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा मे सर्पगंधा, मृत संजीवनी व अपराजिता जैसी औषधियों का कोई विकल्प नही है |
     हिमालय क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधियों का स्थानीय लोगों के जीवन से गहरा संबध रहा है | आज भी सुदूर क्षेत्रों में लोग इन्हीं जडी-बूटियों से तमाम रोगों का इलाज स्वयं कर लेते हैं | सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत कम है जो हैं भी वह काफ़ी दूर | ऐसे में यह औषधियां ही इनके काम आती हैं | पहाड की पुरानी पीढी को इन औषधियों का अच्छा ज्ञान था लेकिन समय के साथ यह परंपरा भी खत्म हो रही है |
     आज चिंताजनक यह है कि हमारी गलत नीतियां व उपेक्षा से यह भंडार खतरे मे है | एक तरफ़ सरकार उदासीन है तो दूसरी तरफ़ स्वार्थी तत्व इन बहुमूल्य औषधियों का उपयोग अपने हित मे करने लगे हैं | कुल मिला कर वर्षों से संभाली यह धरोहर अब संकट के दौर से गुजर रही है |
     आज जरूरत इस बात की है कि हिमालय के इस क्षेत्र मे पायी जाने वाली इन जडी-बूटियों का योजनाबध्द अध्ययन व शोध हो तथा इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वन कानूनों मे भी परिवर्तन किया जाए जिससे इनके अवैध व्यापार को सख्ती से रोका जा सके | अगर समय रहते यह नही किया गया तो एकदिन हिमालय क्षेत्र में औषधियों का यह भंडार पूरी तरह रिक्त हो जायेगा |
    
    

     

Tuesday, 21 October 2014

अब महज दीवाली पर है कौडियों का मोल




( L.S. Bisht ) - साल-दर-साल बढती आधुनिकता के बाबजूद तीज-त्योहारों से जुडी अनेक परंपराओं का स्वरूप बहुत बदला नही है । यह माना जाता है कि दीवाली की रात लक्ष्मी घरों में आती है इसलिए आज भी लक्ष्मी के स्वागत के लिए लोग घर के बाहर दीये जलाते हैं । कुछ ऐसी ही आस्थाओं का जुडाव सदियों से रहा है ।
आज बेशक कौडी का कोई मोल न हो लेकिन कभी पूरे देश में कौडी का ही बोलबाला था । एक समय था जब देश में कोई भी आर्थिक लेनदेन इसके बिना संभव ही नही था । आज भी कौडी को लक्ष्मी का प्रतीक समझा जाता है । यही कारण है कि बंगाल में लक्ष्मी पूजन पर अब भी कौडियों से भरी टोकरी की पूजा की जाती है । इसमें कंघी, तेल, इत्र टीका तथा काजल आदि चीजें भी रखी जाती हैं।इसे लक्ष्मी की टोकरी माना जाता है ।
देश के कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से उत्तर प्र्देश, राजस्थान आदि मे दीपावली पर दीये जलाते समय दीपक में कौडी भी डाली जाती है । घर के आंगन में कौडी डाला हुआ दीपक पूरी रात जलता रहता है । धंनतेरस के दिन इसका विशेष महत्व है । दीयों मे रखी गयी इन कौडियों को बच्चे अवसर पाकर उठा ले जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि जेब में इन्हें रखने से धन की वृध्दि होती है । जुआ खेलने वाले भी इन्हें जेब में रखना नहीं भूलते ।
गोवर्धन पूजा मे भी कौडियों का महत्व है । पूजा के लिए बनाए जाने वाले पर्वत की आकृति को फूल-पत्तों व अन्य चीजों के अतिरिक्त कौडियों से भी सजाया जाता है । यही नहीं, विवाह अवसर पर जब वधू के हाथों में डोरा-कंगन बांधे जाते हैं तब उनमें कौडी भी पिरोई जाती है । किसी नये मकान के निर्माण के समय भी राई, लोहे का छ्ल्ला और कौडी बांधी जाती है । माना जाता है कि ऐसा करने पर मकान दुष्ट आत्माओं से मुक्त रहेगा ।
मनोरंजन के एक साधन रूप मे चौपड खेलंने की एक पुरानी परंपरा रही है । ऐतिहासिक उल्लेखों से पता चलता है कि मन बहलाने के लिए न सिर्फ राजा-महाराजा अपितु बेगमें भी चौपड खेलती थीं । कौडियों के उपयोग का प्रमाण हमें खुदाई से प्राप्त अवशेषों में भी मिलता है । सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं में कौडियां भी प्राप्त हुई हैं ।
कौडियां कई प्रकार की होती हैं । लेकिन मुद्रा रूप मे मात्र दो प्रकार की कौडियों ही चलती थीं । पहली मनी कौडी और दूसरी प्रकार की कौडियां आकार मे छोटी,गोल और चिकनी होती हैं । भारत और आसपास के देशों मे इन्हीं का चलन था ।
इन कौडियों ने संसार के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था व सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इनके महत्व का पता इस बात से ही चल जाता है कि जब धातु के सिक्के चलने लगे तब भी कौडियों का प्रचलन आमजन के बीच चलता रहा । 1930 के आसपास दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों मे एक पैसा सौलह कौडियों के बराबर था ।
बहरहाल अब जमाना बहुत आगे निकल आया है । पूरे देश में रूपया भारतीय मुद्रा के रूप मे विनिमय का माध्यम बना हुआ है । मुद्रा के अलावा सोना व चांदी व्यक्ति की हैसियत का प्रतीक है । ऐसे मे कौडी का आर्थिक क्षेत्र मे कोई दखल नहीं रह गया है । अलबत्ता इसका धार्मिक महत्व बरकरार है और इसीलिए दीपावली पर कौडियों की तलाश शुरू हो जाती है । लेकिन यह महत्व भी कब तक बना रहेगा पता नहीं 

Monday, 20 October 2014

त्योहार पर हावी होता बाजार

    

(L.S. Bisht ) -     वर्षा ॠतु की विदाई के साथ हरी- भरी प्रकृति और शीत ॠतु की सुनाई देने वाली दस्तक के बीच त्योहारों का जो सिलसिला शुरू होता है वह शीत ॠतु की विदाई के साथ ही खत्म हो पाता है | लेकिन वक्त के साथ हमारे इन त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है | सही अर्थों में यह बदलता स्वरूप हमें त्योहार के सच्चे उल्लास से कहीं दूर ले जा रहा है |
     अगर थोडा पीछे देखें तो पता चलता है कि कुछ समय पहले तक दीपावली की तैयारियां महीना भर पहले से ही शुरू हो जाया करती थी | महिलाएं दीवारों, दरवाजों और फ़र्श को सजाने का काम स्वयं करती थीं | पूरा घर अल्पना व रंगोली से सजाया करतीं लेकिन आज कहां है हाथों की वह सजावट | बडे उत्साह के साथ दीये खरीदे जाते | उन्हें तैयार किया जाता और फ़िर तेल और बाती डाल कर उनसे पूरे घर को दुल्हन की तरह सजा दिया जाता था | लेकिन अब किसे है इतनी फ़ुर्सत | बिजली के रंगीन बल्बों की एक झालर डाल सजावट कर दी जाती है | लेकिन कहां दीये की नन्ही लौ का मुण्डेर-मुण्डेर टिमटिमाते जलना और कहां बिजली के गुस्सैल बलबों का जलना- बुझना | परंतु यही तो है बदलाव की वह बयार जिसने इस त्योहार के पारंपरिक स्वरूप को डस लिया है | यही नही, अब कहां है पकवानों की वह खुशबू और खील, गट्टों से भरी बडी-बडी थालियां जो बच्चों को कई कई दिन तक त्योहार का मजा देते थे |
     दर-असल आज हमारे जीने का तरीका ही बदल गया है | इस नई जीवन शैली ने हमें अपने त्योहारों मे निहित स्वाभाविक उल्लास से काट दिया है | अब तो लोग दीपावली के दिन ही पटाखे और मिठाइयां खरीदने दौडते हैं | मिठाई भी ऐसी कि चार दिन तक रखना मुश्किल हो जाए |
     खुशियों का यह पर्व अब फ़िजूलखर्ची का पर्व भी बन कर रह गया है | शहरों मे बाजार ह्फ़्ता भर पहले से ही जगमगा उठते हैं | चारों ओर तामझाम और मंहगी आधुनिक चीजों से बाजार पट सा जाता है | महंगी मिठाइयां, मेवे, गिफ़्ट पैक, खेल-खिलौने, चांदी-सोने की मूर्तियां और सिक्के और भी न जाने क्या-क्या | इन सबके बीच दीपावली से जुडी पारंपरिक चीजें धीरे-धीरे गायब हो रही हैं |
     पारम्परिक आतिशबाजी का स्थान ले लिया है दिल दहला देने वाले बमों और पटाखों ने | एक से बढ कर एक महंगे पटाखे | हर साल करोडों रूपये के पटाखे दीपावली के नाम फ़ूंक दिए जाते हैं | सरकार और गैर सरकारी संगठनों की तमाम अपीलें भुला दी जाती हैं | बल्कि अब तो मुहल्ले स्तर पर आतिशबाजी की होड सी लगने लगी है कि कौन कितने तेज और देर तक आतिशबाजी कर सकता है | यह एक तरह से पटाखों की नही बल्कि दिखावे की होड है जिसे बाजार संस्कृति ने विकसित किया है |
            कुछ ऐसा ही बदल गया है इस दिन घर-मकान की सजावट का स्वरूप | अब दीये की झिलमिलाती बती का स्थान ले लिया है बिजली की सजावट ने | किस्म किस्म की लकदक झालरें और सजावटी कलात्मक मंहगी मोमबत्तियां | बेचारे मिट्टी के दियों का कोई पुरसाहाल नहीं | कुछ तो तेल महंगा और कुछ बदली रूचियों व अधुनिकता की मार |
     दीपावली पर उपहार देने की भी परम्परा रही है | लेकिन उपहार व तोहफ़ों का यह स्वरूप भी मिठाई अथवा खील बताशों तक सीमित नहीं रहा | सजावटी घडी, चांदी के खूबसूरत सिक्के, कलात्मक मूर्तियां व गहने, डिब्बाबंद मेवे और भी तमाम चीजें जुड गई है उपहार-तोहफ़ों से | यही नही, विदेशी शराब की बोतलों को भी उपहार मे देने की संस्कृति तेजी से विकसित हुई है | विदेशी चाकलेट के महंगे गिफ़्ट पैक भी उपहार मे दिये जाने लगे हैं | विज्ञापन संस्कृती ने इसकी जडें जमाने मे मह्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
     कुल मिला कर देखें तो इस त्योहार पर जो उत्साह, उल्लास कभी हमारे दिलो-दिमाग में बरबस घुल जाया करता था, अब चोर दरवाजे से बस एक परम्परा का निर्वाह करते हुए आता है | सच तो यह है कि त्योहार के नाम पर हम अपने संस्कारों व परम्परा का निर्वाह भर कर रहे हैं और वह भी इसलिए कि सदियों से पोषित विचारों से हम अपने को एक्दम से अलग नहीं कर पा रहे हैं | आधुनिकता और परंपरा के बीच हम संतुलन बनाने की जिद्दोजहद मे में उलझे हुऐ हैं | महंगे होते इस त्योहार के साथ मध्यम वर्ग तो येन-केन अपने कदम मिलाने मे समर्थ हो पा रहा है लेकिन कामगारों से पूछिए कि महंगा होता यह त्योहार उनकी जिंदगी को कितना छू पा रहा है | उनके चेहरे की मायूसी बता देगी कि रोशनी का यह त्योहार बदलते स्वरूप में उनकी अंधेरी जिंदगी के अंधेरों को कहीं से भी छू तक नहीं पा रहे हैं |
     सच् तो यह है कि अपने अपने बदल रहे चरित्र में यह रोशनी का पर्व सामर्थ्यवान लोगों के लिए धूम-धडाके, फ़ूहड नाच-गाने, होटलों के हंगामे और हजारों लाखों के जुआ खेलने का त्योहार बन कर रह गया है | लेकिन तेजी से आ रहे बदलाव के बाबजूद एक बडा वर्ग है जो अपने तरीके से निश्छ्ल खुशी के साथ इसे मना रहा है | यह दीगर बत है कि उसके सांस्कृतिक मूल्य भी जमाने की हवा से अछूते नही रहे | फ़िर भी इस पर्व से जुडे उसके मूल संस्कार बहुत बदले नही हैं | आज भी वह घर आंगन की झाड-बुहार करने में बहुत पहले से ही व्यस्त हो जाता है | मिठाई खरीदना और मित्र-रिश्तेदारों में बांटना वह नही भूलता | इस अवसर पर बच्चों के लिए नये कपडे खरीदना भी उसकी परम्परा का हिस्सा है |
     बहरहाल तेजी से बदल रहा है दीपावली का स्वरूप | लेकिन जिस तरह से ह्मरी आस्था से जुडे इस पर्व का सांस्कृतिक स्वरूप बिगड रहा है, उसे अच्छा तो नही कहा जा सकता | धन-वैभव, सामर्थ्य प्रदर्शन, चकाचौंध, दिखावा व स्वार्थ की जो प्रवत्ति तेजी से विकसित हो रही है इससे तो इस पर्व का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाऐगा | दूसरे पर्वों व उत्सवों की तरह इसे तो एक त्योहार की तरह ही हमारी जिंदगी से जुडना चाहिए |