Wednesday, 30 July 2014

परदे से न जुड़ सका कहानियों का सच

               

{ एल.एस.बिष्ट } - कालजयी कथाओं के रचयिता मुंशी प्रेमचंद का साहित्य आम आदमी की जिंदगी का आइना माना जाता है । जिंदगी के हर पहलू पर उनकी गहरी निगाह थी । यही कारण है कि उनकी लिखी कहानियों में हमे समाज का पूरा सच दिखाई देता है । उनका साहित्य समाज की बुराईयों को ही नही उघाडता बल्कि निहायत मामुली समझे जाने वाले किरदारों के संघषों, परेशानियों और सपनों को भी रेखाकित करता है ।  उनकी लिखी कहानियां बरसों बरस बाद भी मौजूदा समाज के संदर्भ में प्रासंगिक लगती हैं । वह च्ररित्र आज भी कहीं न कहीं दिखाई देते हैं ।
      अपनी रचनाओं से सामाजिक सच्चाईयों को उदघाटित करने वाले इस महान रचनाकार की सृजनात्मक यात्रा का एक और् पडाव है जिसमे उनकी जिंदगी के वह पन्ने हैं जो उन्होने फिल्मी दुनिया में बिताए इस आशा में कि उनकी कहानियों व उपन्यासों के आम किरदारों की जिंदगी से जुडे सच करोडों लोगों तक पहुच सकें और वे भी वह महसूस कर सकें जो उन्होने किया । लेकिन क्या ऐसा हो सका ।
      यह जानना कम आशर्च्यजनक नही कि प्रेमचंद की आधा दर्जन से अधिक कहानियों या उपन्यासों पर फिल्में बनी हैं लेकिन आम दर्शक उन्हें लगभग उन्हें भूल चुका है । कम से कम "साहब बीबी और गुलाम " के मुकाबले में तो कहा ही जा सकता है । जब कि  प्रेमचंद जनमांनस के चितेरे के रूप में विमल मित्र से कहीं बड़े और महत्वपूर्ण लेखक हैं । हिंदी का पाठक भी विमल मित्र की तुलना में  प्रेमचंद से अधिक जुडा है । पर्ंतु यह इतिहास का बडा सच है कि फिल्मों के स्तर पर यह बात  प्रेमचंद के साथ नहीं हो पाई ।
      यहां गौर तलब यह भी है कि ऐसा सिर्फ  प्रेमचंद की कहानियों के साथ ही नही हुआ बल्कि समाज से जुडे साहित्य का सिनेमा के परदे से वह रिश्ता बन ही नही पाया जिसकी उम्मीद की जाती रही । विशेषत: हिंदी की साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्में, अपवाद छोड कर, सफल नहीं हो पाईं । जब कि यह बात विदेशी फिल्मों और अन्य भारतीय भाषाओं की  फिल्मों के बारे में इतनी सच नही है ।
प्रेमचंद का फिल्मी दुनिया में प्रवेश 1930 में हुआ । शुरूआती दौर में उन्हें छिटपुट काम मिला लेकिन 1934 उनके लिए महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ । अंजता सिनेटोन ने मुंशी प्रेमचंद को “मिल” फिल्म की कहानी और संवाद लिखने को कहा । इसमें मिलों में मजदूरों की दयनीय हालत और खुले शोषण को बड़ी निडरता से दिखाते हुए पूंजी और श्रम के टकराव को दिखाया गया था । परन्तु अंग्रेज सरकार ने इसके प्रदर्शन पर रोक लगा दी । कुछ समय बाद फिल्म पर्दे पर आई परन्तु उसमें प्रेमचंद के कलम की धार कहीं नहीं दिखी ।एक अच्छी कहानी पर यह एक असफल फिल्म सिद्थ हुई ।
1934 के बाद महालक्ष्मी सिनेटोन ने प्रेमचंद के उपन्यास पर “ सेवासदन “ बनाई लेकिन यह फिल्म भी अपना प्रभाव न छोड़ सकी ।
वर्ग संघर्ष पर आधारित उनकी एक महत्वपूर्ण कृति है “ रंगभूमि “ जिसमें तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के प्रति उनका विरोध व आक्रोश अभिव्यक्त होता है । “रंगभूमि “ का हलधर सैनिकों को ललकारते हुए कहता है – “ जिस आदमी के दिल में इतना अपमान होने पर भी क्रोध न आए , मरने मारने पर तैयार न हो जाए , उसका खून खौलने न लगे वह मर्द नहीं हिजड़ा है । हमारी इतनी दुर्गति हो और हम देखते रहें । जिसे देखो चार गाली सुनाता है और ठोकर मार देता है “। ऐसी जीवंत और यर्थाथवादी कथा पर बनी फिल्म भी प्रभावहीन रही । शायद कागज पर लिखा सच परदे पर न उतर सका ।
      इतिहास की घटनाओं को आधार बना कर लिखी कहानी " शतरंज के खिलाडी " पर इसी नाम से सत्यजीत राय ने फिल्म बनाई । सईद जाफरी व शबाना आजमी जैसे कलाकारों को लेकर बनाई गई यह फिल्म भी पर्दे पर प्रेमचंद की मूल कहानी की आत्मा को जीवंत न कर सकी ।  यह फिल्म सत्यजीत राय की फिल्म बन कर रह गई इसमें  मुंशी प्रेमचंद कहीं नजर नहीं आते ।
      इस तरह  प्रेमचंद का साहित्य जो देश व काल की सीमाओं से परे है, सिनेमा के रूपहले पर्दे पर पूरी तरह प्र्भावहीन रहा । फिल्म नगरी की उल्टी चाल व मांनसिक दिवालियापन को  प्रेमचंद ने महसूस कर लिया था । फिल्मों की घटिया व्यावसायिक रूचि के साथ समझौता न कर पाने के कारृण वापस आ गए थे ।
      परंतु एक सवाल आज भी हमारे सामने खडा है वह यह कि आखिर ऐसे कौन से कारण हैं कि "गोदान " या "शतरंज के खिलाडी " कितनी ही बार पढ्ने वाले पाठ्क इसी कहानी पर आधारित  फिल्म के दर्शक नहीं बन पाते ? इस सवाल का हल तलाशना तब और भी जरूरी हो जाता है जब सिनेमा के पर्दे की साहित्य से दूरियां कुछ ज्यादा ही बढ्ने लगी  हो ।

       प्रेमचंद के साहित्य में नारी मन की पीड़ाओं तथा दूषित सामाजिक व्यवस्था में उनके टूटन की एक बिल्कुल अलग धारा है । नारी जीवन के कथानक पर रचा उनका साहित्य आज भी बेजोड़ है परंतु जब उंनकी लिख्री "औरत की फितरत " पर फिल्म बनी तो उसमें  प्रेमचंद की वह नारी कहीं नजर नहीं आई  ।
      आजादी के बाद भी  प्रेमचंद की कहानियों व उपन्यासों पर फिल्म बनीं लेकिन इस परिवर्तन का फिल्मों में कोई खास प्र्भाव पडा, ऐसा नजर नही आया । प्रेमचंद की रचना " दो बैलों की जोडी " पर फिल्म बनी "हीरा मोती " लेकिन अच्छी पटकथा के बाबजूद फिल्म प्र्भाव न डाल सकी । प्रेमचंद की अमरकृति " गोदान " का होरी भी पर्दे पर बेअसर रहा । यह फिल्म भी होरी की व्यथा को पर्दे पर शिदद के साथ न उतार सकी जैसा कि प्रेमचंद ने कागज पर उतारा था ।
      यानी कुल मिला कर समाज से जुडा साहित्य जो जन जन तक अपना असर डालने में सफल रहा, फिल्मों में सफल न हो सका । फिर भी कोशिशे यदा कदा आज भी जारी हैं ।  


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Tuesday, 22 July 2014

आखिर कैसा हो देश मे विवाह प्रणाली का स्वरूप

          


 ( एल.एस.बिष्ट ) – { दैनिक जागरण में प्रकाशित ब्लाग } पुरातन काल से ही स्त्री- पुरूष का मिलन किसी न किसी रूप मे प्रचलित रहा है | मानव सभ्यता के आज तक के इतिहास पर नजर डाले तो विवाह के कई रूप देखने को मिलते हैं | यह दीगर बात है कि उनमे से कई विवाह पद्द्तियां तत्कालिन समाज मे भी मान्य नही थीं | परन्तु कई कारणों से वह सीमित रूप मे ही रहीं हैं | लेकिन आज कई मोडों से गुजरने के बाद विवाह प्रणाली का जो रूप हमारे बीच है वह भी तेजी से गड्ड्मड होता जा रहा है |
     बदलते सामाजिक मूल्यों मे हमारी परंपरागत विवाह प्रणाली पर भी अंगुली उठनी लगी है | तमामा बुराइयों की घुसपैठ के मद्देनजर एक बडा वर्ग अब इसमे बदलाव का समर्थक नजर आने ल्गा है | लेकिन दूसरी तरफ़ इसे एक आदर्श प्रणाली मानने वालों की संख्या आज भी कम नही |
     लगभग आठवें दशक से दहेज को लेकर हमारी परंपरागत विवाह संस्था पर जो सवाल व विवाद उठे, क्मोवेश वह आज भी जारी हैं | लेकिन इसके समान्तर प्रेम विवाह का जो रूप उभर कर सामने आया, वह भी तमाम शंकाओं और विवादों से परे नही रहा | देखा जाए तो विवाह के स्वरूप को लेकर मौजूदा समाज अजीव मन:स्थिति मे फ़ंसा दिखाई देता है | आज के परिवेश मे संबधों को लेकर जो कुछ हम देख-सुन रहे हैं उस पर भी कोहराम कम नही मच रहा |
     बहरहाल इस सवाल पर सोचने से पूर्व भारतीय समाज की विवाह प्रणाली मे स्वयंवर और नारी हरण जैसी परंपराओं से लेकर प्रेम विवाहों के जो विविध रूप एक साथ देखने को मिल्ते हैं, उन पर नजर डालना जरूरी है |
     विवाह अधिनियम 1955 के पूर्व देश मे विवाह की आठ पद्दत्तियां प्रचलन मे थीं | लेकिन इनमे सिर्फ़ चार को ही मान्यता प्राप्त थी | मान्य विधि से हुए विवाह मे ही महिला को पत्नी होने की मान्यता प्राप्त थी | आठ प्र्कार के जो विवाह प्रचलित थे उनमे गंधर्व विवाह का प्रचलन मुख्यत: क्षत्रियों मे था | ब्रह्म विवाह मे पुत्री का पिता किसी नवयुवक को स्वयं बुला कर उसकी पूजा करके वस्त्र आदि भेंट करता था और फ़िर अपनी पुत्री का कन्यादान करता था | यह एक मान्य विवाह प्रणाली थी | देव विवाह मे विधिपूर्वक यज्ञ करने के उपरान्त कन्यादान किया जाता था | इसमें धार्मिक संस्कारों को महत्व दिया गया था | इसके विपरीत असुर विवाह मे कन्या के बदले पिता को धन दिये जाने का प्रावधान था | दक्षिण भारत मे यह प्रथा बहुत लंबे समय तक रही | राक्षस विवाह प्रथा मध्य प्रदेश की गौंड जाति व इसकी कुछ उपजातियों मे प्रचलित रही | इसमे कन्या को बलपूर्वक उठा लिया जाता था |
     इन विवाह प्रथाओं के अलावा पैशाच विवाह, प्र्जापत्य विवाह व आर्य विवाह प्रथाएं भी चलने मे रहीं | आज जो विवाह प्रथा हमारे सामने है और जिसे लेकर अब काफ़ी आलोचनाएं होने लगी है, विशेष रूप से दहेज को लेकर, यही सर्वमान्य विवाह प्रथा है, जिससे समाज संचालित हो रहा है | थोडे बहुत परिवर्तन के साथ देश के अधिकांश हिस्सों मे इसका ही चलन है | इसमे देखने-दिखाने से लेकर विवाह होने तक सभी रस्मों का विधिवत पालन किया जाता है |
     दर-असल यहां गौरतलब यह है कि इस स्वरूप को लेकर मध्यम वर्ग अपने ही समाज का एक अनावश्यक भय अपने भीतर पालता है | वह इस मामले मे न तो किसी तरह की आजादी लेना चाहता है और न ही देना चाहता है | इधर कुछ वर्षों से विवाह के नाम पर जो अमानवीय स्थितियां समाज झेल रहा है, उसने कई सवाल खडे कर दिये हैं | तमाम कानूनों के बन जाने के बाद भी हालात बहुत ज्यादा नही बदले हैं | लेकिन समाज ने भी इसी को येनकेन ढोते रहने की मजबूरी मान लिया है |
     लेकिन इधर कुछ वर्षों से बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है | युवक-युवतियों का प्रेम विवाह की तरफ़ रूझान तेजी से बढा है | और समाज कि बंधन भी काफ़ी हद तक ढीले हुए हैं | अब अस्सी के दशक की तरह प्रेम विवाह काना-फ़ूसी की चीज नही रह गये हैं | इसे एक आम रूप मे स्वीकार कर लिया गया है | लेकिन विवाद  और शंकाएं यहां भी हैं |
     पिछ्ले एक दशक से महिलाओं के लिए जो अनुकूल सामाजिक परिवेश तैयार हुआ है तथा जिस तरह से युवतियां घर के बाहर निकली हैं इसने एक नई जीवन शैली को जन्म दिया है और वह है ‘ लिव इन रिलेशन ‘ यानी बिना शादी के युवक-युवती का साथ-साथ रहना | महानगरों मे इसका विस्तार बडी तेजी से हो रहा है | लेकिन समाज के एक बडे वर्ग के गले के नीचे यह आसानी से उतर पायेगा, इसमे गहरी शंका है | दर-असल पारम्परिक संस्कार और नैतिक मूल्य इसके रास्ते की सबसे बडी अडचन है | बहरहाल यह महानगरों तक सीमित है |
     कुल मिला कर सवाल जहां का तहां है कि आखिर विवाह का स्वरूप कैसा हो | परंपरा की लीक न पीटते हुए विवाह लडके-लड्कियों पर छोड दिया जाए या फ़िर मौजूदा व्यवस्था को ही जारी रखना व्यापक हित मे होगा | अथवा इसके बीच का कोई रास्ता अधिक उपयुक्त होगा | जिंदगी भर का फ़ैसला रूमानी सपनों के बीच लिये जायें यह भी उचित प्रतीत नही होता | लेकिन दूसरी तरफ़ उनकी सहमति-असहमति अथवा पसंद नापसंद को दरकिनार रखना भी कहीं से उचित नही है | तेजी से बदलते हुए सामाजिक परिवेश व मूल्यों के बीच अब यह जरूरी हो गया है कि विवाह प्रणाली पर नये सिरे से  खुले मन से विचार किया जाए तथा दहेज जैसी कुप्रथा से मुक्त किसी अन्य व्यवस्था को अपनाने की, जो हमारे भारतीय संस्कारों व मूल्यों के अनुरूप भी हो पहल की जानी चाहिये |

     

Tuesday, 15 July 2014

सावन मे आस्था को ढोते कांवरिए






( L. S. Bisht ) - कंधे पर रंग बिरंगे कांवर, उसमे गंगा जल ढोते, रास्ते भर भक्ति और आस्था मे सराबोर नारे । शिवभक्तों की इस भीड को देख सोचना पडता है कि आखिर इनमे कौन सी शक्ति है । बच्चे, बूढे, स्त्री-पुरूष सभी नंगे पैर, पथरीली कच्ची-पक्की सडक पर नदी-नाले पार करते हुए, अंतत: सही समय तक तय कर ही लेते हैं अपना सफर । पांव मे फफोले, पैरों की ऐंठन, जख्म और तलवों की जलन, किसी की भी परवाह न करते हुए भगवान शंकर को अपना जल चढा कर ही दम लेते हैं ।
अटूट आस्था और भक्ति भावना से ओत प्रोत रंग बिरंगी झंडियों, फूल मालाओं से सजी अपनी कांवरों मे रखे ताम्रघट मे यह गंगाजल लेकर चल पड्ते हैं शिव को अर्पित करने के लिए ।माना जाता है कि सावन के महीने में भगवान शंकर का जलाभिषेक करना एक अलग महत्व रखता है । इनमे कठिन यात्रा की यह शक्ति है भक्ति और अटूट आस्था की । हमारे धर्म ग्रंथों मे इस बात का उल्लेख कई जगह मिलता है कि शिव भक्ति से मनोकामनाओं की पूर्ति सहज हो जाती है ।
शिव भक्तों की इस भक्ति और आस्था का एक कारण भगवान शंकर का सरल, सहज और दानी स्वरूप का होना भी है । अगर पल भर मे वह क्रोधित हो तांडव नृत्य कर सकते हैं तो भक्ति भावना से प्रशन्न हो कुछ भी देने मे जरा भी संकोच नही करते । रावण की भक्ति से प्रशन्न होकर उसे अमोघ शक्ति देने वाले तथा भस्मासुर को वर प्र्दान करने वाले भी यही भगवान शंकर हैं ।
इन भोले भंडारी में भारतीय जनमांनस की आस्था की जडें बहुत गहरी हैं । प्रत्येक काल मे यह श्रध्दा का केन्द्र रहे हैं । इन्हें नाराज करने का साहस देवताओं मे नही है । भगवान राम के अनन्य भक्त व रामचरित मानस जैसे महान ग्रंथ के प्रणेता तुलसीदास ने भी शिव वदंना की है ।
भवानी शंकरौ वंदे
श्रध्दाविश्वास रूपिणैं
याम्यां बिना न पश्यंति सिध्दा :
स्वान्त: स्थमीश्वरम ।
कंधों पर आस्था को ढोने वाले इन शिवभक्त कांवरियों का सबसे बडा मेला बिहार के वैधनाथ धाम मे लगता है । यहां सावन के महीने मे श्रावणी मेला के अवसर पर तथा शिवरात्रि मे लाखों कांवरियों की आस्था देखते बनती है । सुदूर गांव- कस्बों से चल कर अपना जल अर्पित करने यहां आते हैं ।
पदमपुराण के अनुसार रावण की कठिन तपस्या से प्रशन्न होकर भगवान शंकर ने अपने बारह ज्योतिर्लिगों में प्रमुख "कामना लिंग" रावण को वरदान स्वरूप दिया । परंतु इसके साथ यह शर्त भी थी कि जमीन पर रखने पर यह उसी स्थान मे स्थापित हो जायेगा । परंतु देवताओं ने चाल चली । रास्ते मे रावण को लघुशंका का आभास हुआ । वह ज्योतिर्लिंग एक ब्राहाम्ण को सौंप कर लघुशंका से निवृत्त होने के लिए कुछ कदम आगे बढा ही था कि ब्राहाम्ण के भेष मे खडे भगवान विष्णु ने वह ज्योतिर्लिंग पृथ्वी पर रख दिया तथा अंतरध्यान हो गये । तब से यह रावणेश्वर वैधनाथ के रूप मे पूजा जाता है ।
इस बारे मे एक और पौराणिक कथा भी है । सतयुग मे दक्ष की पुत्री तथा शिव की पत्नी सती ने अपने पिता के दवारा अपमान किए जाने पर आत्महत्या कर ली थी । भगवान शंकर क्रोधित हो ताडंव नृत्य करने लगे । तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र दवारा सती के शरीर को 52 टुकडों मे खंडित कर दिया । यह अंग देश के विभिन्न हिस्सों मे गिरे । माना जाता है कि सती का ह्रदय इस स्थान पर गिरा था । इसीलिए इस भूमि को ह्र्दयपीठ भी कहा जाता है ।
उत्तरप्रदेश के ही बाराबंकी जिले मे लोधेश्वर महादेव के मंदिर में आसपास जिले के कांवरिए कठिन यात्रा पूरी करते हुये अपना जल भगवान शंकर को अर्पित करते हैं । यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आने वाले इन शिवभक्तों की संख्या बहुत अधिक है । माना जाता है कि इस शिवमंदिर की स्थापना महाभारत काल मे पांडवों दवारा की गई थी । यहां भक्तों की बढती संख्या को देखते हुए आयोजित किए जाने वाले मेले की प्रबंध व्यवस्था जिला प्रशासन ने अपने हाथों मे ले ली है ।
बुलंदशहर स्थित नानकेशवर मंदिर भी आसपास जिलिं के शिवभक्तों की आस्था का केन्द्र है । यहां भी हजारों की संख्या मे कांवरिए जल अर्पित करने आते हैं ।
यह यात्रा भी तीन प्रकार की होती है । सामान्य यात्रा, खडी कांवर तथा डाक कांवर यात्रा । सामान्य के लिए समय सीमा का बंधन नही होता । यात्रा सुविधानुसार कितने ही दिनों मे पूरी की जा सकती है । खडी यात्रा मे कांवरिये थोडी देर के लिए विश्राम कर सकते हैं । लेकिन कांवर को नीचे नही रख सकते । कोई अन्य शिवभक्त ही उसे अल्प समय के लिए ढो सकता है । डाक कांवर यात्रा सबसे कठिन तपस्या है । इसमें कांवर उठा लेने के चौबीस घंटों के अंदर बिना विश्राम किए यात्रा पूरी करनी पडती है । इस यात्रा को करने वालों को "डाक बम " कहा जाता है ।
इस कठिन तपस्या के पीछे है इन लोगों की अटूट भक्ति । यह शिवभक्ति ही इन्हें यात्रा के कष्टों से उपजी पीडा से  मुक्त रखती है । मन मे भगवान शिव की आस्था लिए हर साल गंगा जल लेकर निकल पड्ते हैं - सडक, जंगल , गांव कस्बों से होते हुए अपनी मंजिल की तरफ । भक्ति की यह धारा उनके मन-ह्र्दय मे हमेशा प्रवाहित होती है साल-दर-साल ।

Monday, 7 July 2014

उठने लगे हैं महिला हितों के कानूनों पर सवाल



( L. S. Bisht )  - अभी हाल मे उच्चतम न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या दो व्यस्क लोगों के बीच सहमति से बना रिश्ता टूटने पर पुरूष के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया जा सकता है । इस पर न्यायालय ने कोई आदेश तो पारित नही किया, लेकिन इस तरह के मामलों मे चिंता जरूर जाहिर की । दरअसल इधर कुछ समय से कई मामले देखने को मिले हैं जिनमे रिश्ता खत्म होने के बाद महिलाओं ने पुरूषों के खिलाफ शादी का वादा करके सबंध बनाने पर बलात्कार का मामला दर्ज कराये हैं । 12 जुलाई,2013 को एक मामले मे फैसला सुनाते सुनाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए टिप्पणी की थी कि ऐसे बहुत सारे मामले देखने को मिल रहे हैं, जिनमें महिलाएं सहमति से संबध बनाती हैं और फिर जब रिश्ता टूटता है तो वे कानून को बदला लेने के हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं । ऐसा पैसा उगाहने या फिर लड्के को शादी के लिए मजबूर करने के लिए भी किया जाता है । ट्रायल कोट्स के जज ऐसे मामलों सावधानी से परखें और चेक करें कि ये आरोप असली हैं या इसके पीछे और मकसद छिपा है ।
इसके ठीक दो दिन बाद दहेज के एक मामले की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने दहेज प्रताड्ना के एक  मामले मे बडी तादाद मे की जाने वाली गिरफ्तारी पर चिंता जताई है । न्यायालय ने क्हा है कि पुलिस जब भी ऐसे मामले मे गिरफ्तारी करे तो उसे निजी आजादी और सामाजिक व्यवस्था के बीच बैलेंस रखना जरूरी है । अदालत ने कहा कि दहेज प्र्ताडना से जुडा मामला चूंकि गैर जमानती है इसलिए कई बार लोग इसे हथियार बना लेते हैं ताकि वह पति और उसके रिश्तेदार को इसके जरिए गिरफ्तार करवा सकें । दहेज प्रताडना के ज्यादातर मामलों मे आरोपी बरी होते हैं और सजा दर सिर्फ 15 फीसदी है ।
अपनी टिप्पणी मे अदालत ने आगे कहा कि हाल के दिनों मे वैवाहिक विवाद मे इजाफा हुआ है । शादी जैसी संस्था प्रभावित जो रही है । दहेज प्रताडना कानून इसलिए बनाया गया कि महिलाओं को प्रताडना से बचाया जा सके । लेकिन कई बार लोग इसे गिरफ्तारी का हथियार बना लेते हैं । कई मामलों मे तो बिस्तर पकड चुके पति के दादा-दादी और विदेश मे रहने वाली बहन तक को निशाना बनाया जाता है और गिरफ्तार किया जाता है ।
दरअसल उच्चतम न्यायालय की यह टिप्णियां समाज के सच को बयां कर रही हैं । बदलते समय के साथ विकास के पथ पर अग्रसर हो रहे इस देश मे ऐसे कानूनों की आवश्यकता अनुभव की गई जिनसे महिला हितों को सरंक्षण मिल सके । इसमे दहेज ह्त्या व उत्पीडन को रोकने के लिए दहेज कानून बनाया गया जिसे गैरजमानती रखा गया । इसके बाद दिल्ली मे हुए बलात्कार कांड ने पूरे देश को हिला कर रख दिया । तब फिर बलात्कार संबधित कडे कानूनों की आवश्यकता महसूस की गई और सामाजिक दवाब मे सरकार ने बलात्कार से जुडे कानूनों को संशोधित कर धारदार बना दिया
लेकिन इस दोनो कानूनों को सख्त बनाये जाने के समय इस बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया कि अक्सर इस देश मे ऐसे कानूनों का दुरूपयोग भी होता है । इस चूक का परिणाम यह हुआ कि दहेज कानून ससुराल वालों व पति को प्र्ताडित करने का एक अचूक हथियार बन गया । अक्सर इस एक्ट मे दर्ज मामले फर्जी निकलने लगे । 2012 के आंकडों पर नजर डाली जाए तो देश भर मे धारा 498 ए मे एक लाख 97 हजार लोग गिरफ्तार हुए । यह 2011 के आंकडों से ज्यादा हैं । इनमे 93 फीसदी मामलों मे चार्जशीट भी हुई लेकिन सजा सिर्फ 15 फीसदी मामलों मे ही हो पाई ।
ऐसी ही कुछ बलात्कार संबधित कानूनों के साथ भी है । दिल्ली कांड की गूंज से भयभीत तत्कालीन कमजोर कांग्रेसी सरकार ने आनन फानन मे जो कानून बनाए और जिस तरह से बनाए, वह गैरजरूरी ही नही बल्कि विवादास्पद भी थे । जिसमे देखना, घूरना, छूना, इशारा करना और ऐसे ही न जाने कितनी बातों को जोड दिया गया । जिन्हें साबित करना ही कठिन होगा । देखने और घूरने मे अंतर करना तो और भी टेढी खीर है ।
इस समय आई.पी.सी की धारा 376ए के तहत अधिकतम फांसी की सजा हो सकती है । अगर बलात्कार संवधित कानूनों का गहराई से अध्ययन करें तो सारा मामला महिलाओं के पक्ष मे ही जाता है । दरअसल इस कानून की सबसे मजबूत लेकिन कमजोर कडी भी यह है कि ऐसे मामलों मे लड्की के बयान को अहम सबूत माना गया है । दूसरा यह कि ऐसे मामलों मे चाहे वह बलात्कार का हो या छेडछाड का, शिकायत के बाद पुलिस को अधिकार है कि वह आरोपी को गिरफ्तार कर ले यानी इन्हें संज्ञेय अपराध की परिधि मे माना गया है । इसमे एफ.आई.आर दर्ज करने के बाद बिना वारंट के भी आरोपी को गिरफ्तार किया जा सकता है ।
दरअसल सामाजिक दवाब मे और राजनीतिक लाभ लेने की होड से भी बनाये गये इन कानूनों मे आरोपी को तनिक भी सुरक्षा नही है । महिला वर्ग की वाही वाही लूटने की मानसिकता को रख कर बनाये गये इन कानूनों का दुरूपयोग भी हो सकता है, इस पर सोचने की जरा भी जहमत नही उठाई गई । आज इसका परिणाम सामने है । बात यहां तक पहुंच गई है कि लिव-इन-रिलेशेन मे कुछ समय अपने पुरूष मित्र के साथ, अपनी मर्जी से रहने वाली लड्की, आपसी खटपट होने पर लड्के के विरूध्द बलातकार का आरोप लगा देती है । यह लडकी से कोई नही पूछ्ता कि इस देश का कौन सा धर्म कौन सी संस्कृति किसी लड्की को बिना विवाह के संबध बनाने की आज्ञा देता है । क्या इस स्थिति से बचना उस लड्की का नैतिक कर्तव्य नही बनता । यही इस कानून की कमजोरी है । लड्का ही दोषी समझा जाता है ।
यही नही, नौकरी दिलाने के नाम किए गये शोषण के आरोपों की संख्या तेजी से बढी है । दरअसल यहां भी महिला के स्वार्थ को पूरी तरह से नजर-अदांज करते हुए मामला पुरूष के खिलाफ चला जाता है । अक्सर ऐसे मामले व्लैकमेल करने के लिए भी किए जाने लगे हैं । गांव-कस्बों मे आपसी रंजिस होना आम बात है । बदला लेने के लिए घर की महिला से छेडछाड की फर्जी रपट लिखा कर दूसरे पक्ष को परेशान करने की प्रवत्ति भी इधर देखने को मिली है ।
कुल मिला कर जल्दबाजी, भावुकता और मीडिया के शोर-शराबे के दवाब मे बनाए गए इन कानूनों के दुरूपयोग की बाढ आ जाने से न्यायालय को संज्ञान लेना पडा है । अब जरूरी है कि इन कानूनों का सही पंचनामा कर इन्हें संतुलित बनाया जाए । इसके साथ ही इसमे झूटी रपट लिखाने वाले को भी कडे दंड का प्राविधान रखना जरूरी है तथा जिसका फर्जी मामले के कारण् सामाजिक सम्मान आहत हुआ है उसे मुआवजा दिलाने का भी कानून रखा जाए । इन कानूनों के दुरूपयोग को रोकने के लिए यह जरूरी भी है ।

Thursday, 3 July 2014

बढती जा रही हैं आत्महत्याओं की घट्नाएं

   

 ( L.S. Bisht )  -  आर्थिक विकास व तेजी से बदल रहे सामाजिक परिवेश के बीच देश मे मानसिक रोगियों व आत्महत्या के मामलों मे तेजी से वृध्दि हो रही है | आज हर पांच मे एक व्यक्ति मानसिक रूप से बीमार है तथा नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार औसतन एक घंटे मे 15 लोग आत्महत्या कर रहे हैं | अभी तक यह माना जाता रहा है कि विकसित देशो मे ही व्यक्ति मानसिक रोगों का आसानी से शिकार हो जाता है लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि भारत मे ही लगभग 1 करोड लोग मानसिक रूप से बीमार हैं |
     मानसिक रोग सामान्यत: शर्रीर मे धीरे धीरे विकसित होते रहते हैं और समय रहते चेतावनी भी देते रहते हैं | लेकिन जानकारी के अभाव मे इन संकेतों को मनुष्य नही समझ पाता | यदि शुरूआती अवस्था मे ही इन रोगों का उपचार करा लिया जाए तो लगभग सत्तर फ़ीसदी से अधिक मामलों मे आसानी से रोगमुक्त होने की संभावना रहती है |
     विकास के लिए जूझते भारत जैसे विकासशील देश मे सामाजिक-मानसिक असंतुलनों का असर दिखना कोई असाधारण बात नही है | परन्तु चिंताजनक यह है कि अभी तक इस पहलू को गंभीरता से लिया ही नही गया है | वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार भारत अपने स्वास्थ्य बजट का 1 प्रतिशत से भी कम मानसिक स्वास्थ मे खर्च करता है जबकि दूसरे देशों मे यह 10 प्रतिशत, 12 तथा 18 प्रतिशत तक है |
     दर-असल शहरीकरण समाज के फ़ैलाव ने जीवन को जटिल बनाया है | सामाजिक-सांस्कृतिक स्त्रोत शिथिल हुए हैं और पारिवारिक संबधों को भी धक्का पहुंचा है | भारत जैसे विकासशील देशों में भौतिक उपलब्धियों के चलते तेजी से बदलता सामाजिक-आर्थिक परिवेश काफ़ी हद तक जिम्मेदार है | दूसरी तरफ़ इस ओर किए गये प्रयास आगे नही बढ पाये हैं | देश मे मानसिक उलझनें किस गति से लोगों को अपना शिकार बना रही हैं, इसका पता आत्महत्याओं के बढते आंकडों से ही चल जाता है | 2002 से 2012 तक के दशक मे आत्महत्याओं मे 23 प्रतिशत की बढोत्तरी दर्ज की गई है | 2002 मे जहां 1,10,417 लोगों ने इस कदम को उठाया वहीं यह सख्या 2012 मे 1,35,445 तक पहुंच गई |
     देश मे इस समय आत्मह्त्या की दर प्रति एक लाख मे 11.2 है | आत्महत्या के कारणों को जानने के लिए अब तक जो शोध हुए हैं, उनसे प्रमुख रूप से एक बात उभर कर सामने आई है कि मनुष्य भीषण मानसिक विषाद के दौर मे ऐसा करता है | इसमे संदेह नही कि भारतीय समाज मे मानसिक विषाद मे लगातार बढोत्तरी हो रही है | दर-असल जिस तरह से हमारा सामाजिक ताना बाना उपभोक्तावाद के चलते छिन्न-भिन्न हो रहा है, इससे चिंताएं और कुंठाएं बढी हैं | जो अंतत: दिमाग को अपना शिकार बना रही हैं |
     यहां गौरतलब यह भी है कि हमारे देश मे मानसिक विषाद से पीडित हो आत्महत्या करने मे दक्षिण भारत का हिस्सा काफ़ी अधिक है | 2012 के आंकडे बताते हैं कि तमिलनाडू आत्महत्याओं के मामले मे सबसे ऊपर है (16,927 ) उसके बाद महाराष्ट्र (16,112) पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश व कर्नाटक (12,753) | यानी इन पांच राज्यों मे कुल आत्महत्याओं का हिस्सा 55.3 प्रतिशत है | यहां यह अध्ययन का विषय है कि आखिर इन राज्यों मे मानसिक विषाद के कारण क्या हैं | आखिर यहां ऐसा क्यों हो रहा है |
     दक्षिण के इन राज्यों के अलावा उत्तर पूर्व के राज्यों : बंगाल, त्रिपुरा, सिक्किम व मिजोरम मे भी आत्महत्या की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है | उत्तर प्रदेश, पंजाब व बिहार जैसे उत्तरी राज्यों मे यह प्रतिशत औसत से कम है, लगभग 4 प्रतिशत | उत्तर प्रदेश एक इस मामले मे थोडा संतोष देता दिखाई देता है | देश की जनसंख्या मे 16.9 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले इस राज्य की आत्महत्याओं के मामलों मे हिस्सेदारी मात्र 3 प्रतिशत है जबकि राष्ट्रीय दर 11.2 है |
     इस संबध मे गौरतलब यह भी है कि देश के बडे शहरों मे स्थिति लगातार चिंताजनक होती जा रही है | यहां पर भी चैन्नई सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति मे दिखाई देता है | इसके बाद बंगलूरू ,  दिल्ली व मुंबई का नम्बर आता है | इसका सीधा सा मतलब है कि देश के बडे शहरों मे तनाव बढता जा रहा है | गौर से देखें तो हमारे शहरों की रोजमर्रा की जिंदगी मे भी यहां तनाव साफ़ झलकने लगा है |
     अपनी ही जिंदगी से मायूस हो दुनिया से अलविदा कहने के कारणों की पडताल करें तो पता चलता है कि इसके दो मुख्य कारण हैं – पारिवारिक समस्याएं व बीमारी | कुल की जाने वाली आत्महत्याओं मे इनका प्रतिशत क्रमश: 25.6 व 20.8 है यानी 46 प्रतिशत आत्महत्याओं के पीछे यही दो मुखय कारण हैं | ऊपरी तौर पर हम जिन कारणों को अधिक जिम्मेदार मानते आये हैं, वह वास्तव मे हैं नही | दहेज ( 1.6 प्रतिशत ) गरीबी (1.9 प्रतिशत ) व प्रेमसंबध (3.2 प्रतिशत ) आदि के कारणों से बहुत कम लोग आत्महत्या करते हैं |
     बहरहाल इसमे कोई संदेह नही कि आर्थिक विकास के साथ जिंदगी की जटिलताएं भी बढ रही हैं और दिमाग की उलझनें भी | बढती महत्वकाक्षाएं, एक्ल परिवार व आत्मकेन्द्रित जीवन शैली आग मे घी का काम कर रही हैं | शहरों मे मष्तिक मे बढता द्वाब रोजमर्रा की जिंदगी मे दिखाई देने लगा है | इसलिए यह जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाए तथा दिमागी उलझनों पर अध्ययन किया जाना भी आवश्यक है | इन्हें रोक पाना या कम कर पाना तभी सभव है जब कारणों का सही विश्लेषण हो सके | सबसे जरूरी है मानसिक उपचार की दिशा मे गंभीर प्रयास किए जायें | इससे कई लोगों को उस आखिरी बिन्दु तक जाने से पूर्व ही रोक पाना संभव हो सकेगा