Tuesday, 30 September 2014

30 सितम्बर /अलविदा, बहुत याद आओगे तुम आॉरकुट


( L.S. Bisht ) - किसी का जिदगी मे आना हवा के ताजे झोंके की मानिंद खुशियों से सराबोर कर देता है । तुम्हारा आगमन लाखों युवा दिलों के लिए कुछ ऐसा ही रहा । देखते-देखते तुम सभी के चहेते बन गये । यह एक तरह से स्वाभाविक ही था । दर-असल बदल रहे सामाजिक परिवेश मे भारत जैसे विकासशील देश के युवाओं को ऐसे ही किसी दोस्त की चाहत थी जिसके साए तले वह उन सभी बातों को साझा कर सकें जिन्हें वे अभी तक नही कर सकते थे । आरकुट,  तुमने यह काम बखूबी किया । तुम उन सभी के दिल मे बस गये ।


समय गुजरता गया । लम्हा-लम्हा गुजरना ही समय की अपनी गति है, वह कभी किसी के लिए रूकता नही । फेसबुक नाम से आए एक नये दोस्त ने तुम्हारे चाहने वालों को अपने मोहपाश मे बांधना शुरू किया । विदाई के इन लम्हों मे, तुम्हें यह तो मानना ही पडेगा कि नये दोस्त मे कुछ खास था जो शायद तुम चाह कर भी न दे सके थे । आज तुम्हारे लाखों चाहने वाले इस फेसबुक के दोस्त हैं जो कभी तुम्हारे थे ।
लेकिन अपनी खूबसूरत युवा जिंदगी के जिन लम्हों को उन्होने तुम्हारे साथ गुजारा, साझा किया वह कभी भूले नहीं । और न ही कभी भूल पायेंगे । तुम्हारे समय की किशोरवय की दह्लीज् मे खडी वह पीढी आज पूरी तरह युवा हो चुकी है और जो युवा थे वह अब प्रौढावस्था की ओर धीरे-धीरे कदम बढा रही है । लेकिन एक जादू था तुम्हारा आरकुट वह सर चढ कर बोला ।

सच कहूं तो तुमने अपने दौर के किशोर व युवा दोस्तों को बहुत कुछ दिया है और उन्हें बहुत कुछ ऐसा सिखाया जिसकी कल्पना उस कालखंड मे संभव न थी । शर्मीले, सकुचाए स्कूल-कालेज के लाखों बच्चों को तुमने ही बोलना, लिखना और विचारों को साझा करना सिखाया । आज वही सब तो फेसबुक के दोस्त हैं । बहुत बेलौस और बिंदास । राजनीति की उठा-पटक हो या कि जिंदगी की रपटीली राहों के निजी एहसास, वह सबकुछ साझा करने लगे हैं । अंतरंग लम्हों की फोटो को भी देखने-दिखाने मे उन्हें कोइ परहेज नही । देश के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक , सभी मुद्दों पर तुम्हारे वह दोस्त अपने परिपक्व विचारों को रखना सीख गये हैं । यह सब वह शायद न कर पाते अगर तुमने नींव न डाली  होती ।

एक बात और आरकुट । तुम्ही ने एक पूरी पीढी को प्यार करना, दोस्त बनाना और दोस्ती निभाना सिखाया । आज न जाने कितने तुमसे जुड कर उनसे जुड सके जिसके साथ वह जिंदगी के हमसफर बन गये । जो हम्सफर न बन सके, वह आज भी दोस्त हैं । सच तो यह है कि दोस्त , दोस्ती और युवा जिंदगी को तुमने ही नये तरीके से परिभाषित किया ।

तुम हमेशा के लिए उनकी जिंदगी से जा रहे हो, यह जानकर सभी शोक मे डूब गये । सभी को याद आ रहे हैं वह दिन जब वह तुम्हारे साथ थे । उन दिनों की ढेरों खूबसूरत यादों को वह सहेज कर रखना चाहते हैं । जैसा भी है तुम्हारा यूं जाना कहीं न कहीं उन्हें भावनात्मक टीस तो दे ही रहा है ।

मेरी पीढी के लोगों को यह दुख हमेशा सालता रहेगा कि वह तुम्हारा हिस्सा कभी न बन सके । शायद तुम्हारा अस्तित्व मे आना कुछ विलम्ब से ही हुआ या फिर हमारा इस दुनिया मे आना कुछ पहले । बहरहाल हमारी यादों के भी  लंबे काफिले हैं लेकिन वहां तुम नही हो । काश ऐसा न होता । बहरहाल तुम्हारे चाहने वाले लाखों दोस्तों को एक उम्मीद अभी भी है कि शायद तुम फिर कभी लौटोगे उनकी जिंदगी मे,  बेशक एक नये बदले चेहरे के साथ । इसलिए कभी अलविदा न कहना । 

Saturday, 20 September 2014

10 जून, 1984 को प्रकाशित कहानी / दंगा



     मेरी यह कहानी उस दौर मे लखनऊ व इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित पत्र अमृत प्रभात में 10 जून, 1984 के साप्ताहिक परिशिष्ट में प्रकाशित हुई थी | अपने तीन दशकों के लेखकीय जीवन में मैने सिर्फ़ तीन कहानियां लिखीं जिनमे से यह एक है | सामयिक विषयों पर लेख व मानवीय तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलूओं पर फ़ीचर  मेरे लेखन की मुख्य विधा रही है | कुछ लघुकथाएं भी लिखीं व प्रकाशित हुईं | लेकिन मुख्यत: लेख व फ़ीचर | यह कहानी आज भी प्रासंगिक लगती है | *******

     वहां बहुत से लोग जमा हो गये थे | उनमें ज्यादातर बच्चे और औरतें थीं |
कुछ ऐसे बच्चे भी थे जो अभी जीवन और मृत्यु आदि शब्दों का अर्थ भी नही समझ्ते थे | उत्तर दिशा से बच्चों का एक झुंड चला आ रहा था | उनमें से कुछ तो एकदम बिस्तर से उठ कर चले आ रहे थे | कुछ बच्चों की नाक बह रही थी |
और वे अपनी गंदी कमीजों के बाजुओं से उसे साफ़ करने का असफ़ल प्रयास कर
रहे थे | कुछेक बच्चों के हाथ मे बासी रोटी के टुकडे थे जो उनके सुबह का नाश्ता
था | सभी आकर उसके चारों तरफ़ खडे हो गये |
     अब तक अच्छी खासी भीड जमा हो चुकी थी | झोपड झुग्गियों में शायद वैसे भी लोग मृत्यु के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं | लोग छोटे छोटे झुंडों
में बंट कर खडे हो गये थे | जितने मुंह उतनी बातें |
     ठंड कुछ ज्यादा होने के कारण मैने दीवार की आड ले रखी थी | शायद इसीलिए लोगों को मेरी उपस्थिति का आभास न था |
     मैं सोच रहा था क्या कुछ न सोचा था उसने अपने लिए – एक घर ,
इज्जत की जिंदगी और न जाने क्या क्या सपने थे उसकी आंखों मे |  हां, एक गूंगा भाई भी तो था उसका | कितने बडे-बडे सपने देखे थे उसने उसकी उस अपाहिज जिंदगी के लिए लेकिन सब कुछ एक पल में------|
     नीचे कच्ची जमीन मेंउसका भौतिक शरीर पडा था,एक्दम निर्जीव | आंखे आकाश में शून्य को ताक रही थीं |
     एक साल पहले ही तो आयी थी वह एक्दम फ़टेहाल कपडों में | शरीर में धूल की पर्तें जमी हुई थीं | शरीर सूख कर कांटा हो गया था | देखते ही दया आ गयी थी | ‘ माई जी भगवान भला करेगा | कोई काम दे दो मांई | “ मैं अचानक बाहर निकला | मुझे बाहर आया देख वह कुछ जोर से बोलने लगी थी |
     “ क्या चाहिए, तुझे ? “ मैने पूछा ‘ काम चाहिए साब | कुछ भी काम दे दो साब |’  ‘ नही-नही यहां कोई काम नही | कोई होटल देखो वहीं काम मिलेगा | मैने कुछ टालते हुए कहा | अब उसने दोनों हाथ जोड लिए थे | आंखों में पानी की बूंदें चमकने लगी थीं | कुछ सहमते हुये वह कुछ करीब आयी और पैरों में गिर कर गिडगिडाने लगी थी | ‘ साब ये मेरा भाई है | गूंगा है बोल नही पाता साब | दो दिन से इसने कुछ नहीं खाया | ‘आगे के शब्द उसके आंसुओं में डूब गये थे |
     उसे घर मे सफाई करने व बर्तन साफ़ करने का काम दे दिया था | उसका इस दुनिया में कोई भी नही था | सिवाय एक भाई के वह भी गूंगा | तब से कल तक वह बराबर आती थी | मौसम के साथ फ़िजा बदलती लेकिन उसका हमेशा वही भाव शून्य चेहरा रहता |
     उसे खाना व कपडे के अलावा पचास रूपया भी देते थे, लेकिन शायद ही उसने उन्हें कभी खर्च किया हो | एक दिन मां जी से कह रही थी “ मां जी एक बात कहूं ? “ ‘ हां-हां बोलो क्या बात है | मां जी मुझे एक गुल्लग ला दो | मैं उसमें पैसा रखूंगी | पैसा ? क्या करेगी उनको जमा करके ? मां जी ने यूं ही उत्सुकतावश पूछ लिया था | उन पैसों से मैं भैय्या को स्कूल पढाऊगीं | और फ़िर जब वह स्कूल लिख पढ जायेगा तो उसके लिए एक घर बनवाऊंगी | मैं भी उसी में रहूंगी | मां जी ने उसे एक गुल्लक ला दिया था | हर महीने उसे जो कुछ मिलता उसमें रख लेती |
     अपनी मर्जी से वह सुबह की चाय भी बना लेती थी | अब तो लगता ही नही था कि वह नौकरानी है | घर की एक सदस्य  बन गयी थी |
     अचानक कल दोपहर को शहर र्में किसी बात को लेकर दो संप्रदाय के लोगों के बीच कहा-सूनी हो  गई थी और शाम तक उसी ने एक भयंकर दंगे का रूप ले लिया | कई लोगों को अपनी जान गंवानी पडी | न जाने कितने मासूम बच्चों और औरतों की भी बलि चढ गयी थी |
     चौक की मुख्य सडक् में उसका शव पडा था | उसके पेट मे चाकुओं के गहरे घाव थे | बगल मे एक गंदा सा झोला पडा था | कुछ बासी रोटियां जमीन में बिखरी पडी थीं | लेकिन उस अभागी लडकी के साथ ऐसा क्यों हुआ ? मैं यही कुछ सोचते हुए न जाने कहां खो गया था | वह न तो हिंदू थी और न ही मुसलमान और न ही ईसाई | वह तो सिर्फ़ एक गरीब , असहाय मजदूर जिंदगी थी | उसका न तो कोई ईश्वर था न ही अल्लाह |
     जूठे बर्तन , गंदी फ़र्श और जूठा खाना- यही तो सब कुछ था उसका | हिंदू, मुसलमान ,ईसाई सभी के घरों मे काम करती थी वह और बदले मे वही दो बासी रोटियां और कुछ पुराने कपडे |
     उसके उन सपनों का तो कोई अपना मजहब न था | फ़िर उन ढेर सारे सपनों की ये अकाल मौत क्यों ?
     अब लोग उसकी अर्थी को कंधों मे उठाये धीरे धीरे आगे बढ रहे थे |वही फ़टेहाल लोग, नंगे भूखे बच्चे ही तो उसके सच्चे साथी थे |

     बगल की पांच मंजिला कालोनी की खिडकियां अब खुल रही थीं | उनमें से कुछेक ने खिडकियों से झांका और फ़िर खिडकियां बंद कर दीं| दूर कहीं से सायरन की आवाज आ रही थी | शायद कर्फ़्यू हट गया था | 

Sunday, 14 September 2014

चमकदार सपनों में खोता बचपन

     

[ एल. एस. बिष्ट ] -   जगजीत सिंह की एक  बहुत ही अच्छी गजल है जो बरबस ही याद आती है – ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
 भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
 मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
 वह कागज की कश्ती, वह बारिश का पानी |
          बचपन को लेकर कही गई यह पंक्तियां उम्र की एक दहलीज पर पहुंचने पर किसी को भी भावुकता के समंदर मे डूबते- उतराने के लिए काफ़ी है | आखिर किसी को भी क्यों न बार-बार याद आए अपना बचपन | वह मासूम दिन, खेलने-कूदने के वह  बेफ़िक्र लम्हें कभी लौट कर नहीं आते |
     हर किसी की जिंदगी में बचपन का वह दौर और उससे जुडी यादें वसंत के फ़ूलों के मानिंद हमेशा महकती रहती हैं | लेकिन आज हमारे शहरों व महानगरों में यह बचपन कहीं खोता जा रहा है | चकाचौंध संस्कृति व चमकदार सपनें बचपन की मासूमियत को जाने अनजाने डसने लगे हैं और हम इसे बदले परिवेश के एक हिस्से के रूप में स्वीकार भी करने लगे हैं |
     लेकिन यदा कदा कुछ ऐसा भी होने लगता है कि हमारी यह सोच सवालों के कटघरे में खडी हो जाती है | हम सोचने लगते हैं आखिर ऐसा क्यों हुआ |
     अभी हाल में एक फ़िल्म अभिनेत्री श्वेता बसु को वेश्यावृति के आरोप में हैदराबाद के एक होटल से गिरफ़्तार किया गया | 23 वर्षीय इस अभिनेत्री ने इकबाल और मकडी जैसी फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अपनी प्रतिभा का बेहतरीन प्रदर्शन किया था और उसे बेस्ट चाइल्ड आर्टिस्ट का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिला | यही नही, इस अभिनेत्री ने कई दूरदर्शन सीरियल में भी बेजोड अभिनय किया और अपनी छाप छोडी | गिरफ़्तार किए जाने पर उसने बताया कि आर्थिक तंगी व घर की जिम्मेदारियों के कारण उसे यह सब करना पडा
         श्वेता बसु की यह नियति कई सवाल खडी करती है | यह भी सच है कि इस त्रासदी को भोगने वाली वह अकेली अभिनेत्री नहीं है | इसके पूर्व भी दक्षिण की कुछ अन्य अभिनेत्रियां व टी वी सीरियल से जुडी कलाकार वेश्यावृत्ति के विवाद का हिस्सा बन चुकी हैं जिन्हें समय के साथ भुला दिया गया |
     यही नही, फ़िल्मी दुनिया की चमक से जुडे और भी कई बच्चों को गुमनामी और उपेक्षा की त्रासदी भोगनी पडी है | जूनियर महमूद, मास्टर राजू को आज भी दूरदर्शन में कई छोटे मोटे रोल करते देखा जा सकता है | इनके अलावा मास्टर अलंकार, सलाम बाम्बे के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शफ़ीक सैयद, आस्कर विजेता फ़िलम स्लमडाग की रूबीना अली, बहुचर्चित फ़िलम तारे जमीं पर बतौर बाल कलाकार दर्शील सफ़ारी, सत्तर के दशक की बेबी गुडडु, अस्सी के दशक में मासूम फ़िल्म से लोकप्रिय हुए जुगल हंसराज यह सभी आज कहां हैं |
     यह तो सिर्फ़ चंद उदाहरण हैं | गौर से देखें तो हमारे बडे शहरों व महानगरों में आज ब्च्चे इस राह में चल पडे हैं | फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध और दूरदर्शन की बढती लोकप्रियता ने इन्हें इस कदर अपने मोहपाश में बांध लिया है कि यह सब कुछ भूल कर इस दुनिया में छा जाने को आतुर दिखाई देने लगे हैं | अपने बचपन के जिन दिनों में इनका नाता स्कूल और किताबों से होना चाहिये था, यह बच्चे आडिशन टेस्ट की कतारों में खडे नजर आते हैं |
     दर-असल इधर कुछ वर्षों से शहरों का सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश तेजी से बदला है | इसे बदलने में हमारे लुभावने विज़ापनों और टी वी सीरियलों की रंगीन दुनिया की एक मह्त्वपूर्ण भूमिका रही है | अपनी टी आर पी बढाने व बच्चों तथा महिलाओं को अपने से जोडने की भी चुहादौड ने एक बिल्कुल नई संस्कृति को विकसित किया है | रियलटी शो जैसे कार्यक्रमों ने तो मानो बच्चों की दुनिया में क्रांति ही पैदा कर दी है | किसी रियलटी शो मे अगर देश भर के बच्चों को गाने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है तो किसी मे नृत्य कला के जलवे बिखरने के लिए | इसके लिए बाकायदा शहर-दर शहर आडीशन टेस्ट आयोजित किये जा रहे हैं |
     इन कार्यक्रमों की रंगनियों और छोटे परदे पर अपने को नाचते गाते देखने के मोह ने शहरों के बच्चों को अपने मोहपाश मे बांध लिया है | यह अपनी पढाई लिखाई छोड इन कार्यक्रमों मे दिखाई देने के लिए अपना सब्कुछ दांव पर लगाने को आतुर भी दिखाई देने लगे हैं |
     दुर्भाग्यपूर्ण पहलू तो यह है कि इस चुहा दौड में इन बच्चों के माता-पिता भी पूरी तरह भागीदार हैं | वह भी अपने लाडले को टी वी के इन कार्यक्रमों में शामिल कराने के लिए जी तोड कोशिश में जुटे दिखाई देते हैं | मानो यही इनके बच्चों का एक्मात्र लक्ष्य हो | चकाचौंध और शोहरत का नशा इस कदर है कि इसके लिए अपने बच्चों के भविष्य को भी खतरे में डालने से कोई परहेज नहीं| ऐसे तमाम बच्चों को महानगरों में घंटों रियाज करते देखा जा सकता है |
     यहां गौरतलब तो यह है कि परदे की चकाचौंध व शोहरत के मोहपाश ने बच्चों व इनके माता-पिता कि इस कदर अपनी गिरफ़्त मे ले लिया है कि इन्हें भविष्य के खतरे नहीं दिखाई दे रहे हैं |  जब कि इस दुनिया की सच्चाई यह है कि चंद दिनों की चांदनी फ़िर अंधेरी रात | ह्जारों मे दो एक बच्चे बेश्क ऊंचाइयों तक पहुंच ग्लैमर की इस दुनिया का हिस्सा बन भी जायें लेकिन अधिकांश के हिस्से में तो मायूसी ही आती है | कुछ समय तक परदे पर दिखाई देने बाली यह बाल प्रतिभाएं समय के साथ गुम हो जाती हैं | ऐसे में पढाई-लिखाई को पहले ही नजर-अंदाज कर देने वाले इन बच्चों के लिए यही कहा जा सकता है कि न खुदा ही मिला न विसाले सनम | और फ़िर चंद दिनों की यह शोहरत और वाही वाही इन्हें कहीं का नहीं छोडती |

     दर-असल ग्लैमर और चकाचौंध की नव विकसित यह दुनिया हमारे चारों तरफ़ बडी तेजी से पंख फ़ैला रही है | इसकी चमक के पीछे की अंधेरी दुनिया हमें आसानी से दिखाई नही देती | मासूम बच्चे भी इस चमक दमक का आसानी से शिकार बनने लगे हैं | यही स्थिति रही तो न जाने कितने बच्चे इस चमकदार दुनिया के मोह मे पड कर एक अंधेरी, गुमनाम और कुंठित दुनिया की राह मे चल पडेंगे |  जरूरी है कि समय रहते इन खतरों को महसूस कर बच्चों को उनके स्वाभाविक बचपन में ही रहने दें जहां से वह अपने लिए एक खुशहाल भविष्य की राह बना सकें | 

Tuesday, 9 September 2014

' इस्लामिक स्टेट ' के खतरनाक मंसूबे


( L. S. Bisht ) - भारत जैसे देश में आज भी यह माना जाता है कि हम बच्चे को जैसा सिखायेंगे वह वैसा ही बनेगा । यहां तक कि हम उसके बचपन के लिए खिलौनों का चुनाव भी बहुत सोच समझ कर करते हैं । हिंसक खिलौने से उसके बचपन को दूर रखने की पूरी कोशिश की जाती है । ऐसे खिलौनों को जो उसमें रचनात्मक प्र्वत्ति को विकसित करे उपलब्ध कराते हैं । लेकिन दूसरी तरफ दुनिया के एक कोने मे बच्चों को हिंसा की आग में जानबूझ कर ढ्केलने के प्रयास किए जा रहे हैं और यह सब धर्म की नाम पर किया जा रहा है ।
इराक में सक्रिय आतंकवादी संगठन ' इस्लामिक स्टेट ' ने अब बच्चों को अपनी जेहाद का मोहरा बनाया है । अभी तक इस संगठन के मुखिया अबु बकर अल बगदादी मुस्लिम युवाओं को दुनिया में इस्लामिक स्टेट का सपना दिखा कर अपनी लडाई में शामिल करते आये हैं । बगदादी अपने मजहबी भाषणों और वीडियो के जरिये मुस्लिम युवाओं को यह समझाने में सफल रहा है कि दुनिया में इस्लाम खतरे मे है और शरीयत के अनुसार एक इस्लामिक देश बनाया जा सकता है जो दुनिया पर राज करे लेकिन इसके लिए एकजुट होकर लडना होगा । कई देशों के युवा उसकी बातों से प्र्भावित हो उसके साथ शामिल हो चुके हैं ।
अगर सीरियन आब्जर्बेटरी फार ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के आंकडों पर विश्वास करें तो इस संगठ्न के पास लगभग 50 हजार लडाके इरान में और 30 हजार सीरिया में हैं । इनमें अच्छी खासी संख्या विदेशी लडाकों की भी है । इनमें मुख्य रूप से फ्रांस, ब्रिटेन, चेचेन्या आदि देशों के युवा शामिल हैं ।
लेकिन अब बात सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह संगठन अब मासूम बच्चों को अपना मोहरा बनाने लगा है । पांच साल से 14 साल तक के बच्चों को हथियार चलाने का प्रशिक्षण देकर इन्हें लडाई में झोंका जा रहा है । दर-असल बच्चों को शामिल करना इस संगठन की बहुत सोची समझी रणनीति है । यह एक पीढी के मासूम दिलो-दिमाग में अभी से नफरत पैदा कर इस्लाम के लिए लडने वाले जेहादियों की एक खतरनाक फौज तैयार कर रहा है । उसका मकसद आने वाले समय के लिए इन्हें तैयार करना है ।
यही नही, इन बच्चों को लडाई के मोर्चों पर एक ढाल के रूप में भी इस्तेमाल करने की उसकी सोची समझी योजना है । वह जानता है कि जब इन कम उम्र बच्चों के हाथों में हथियार होंगे और यह आग उगल रहे होंगे तब अमरीका या कोई भी दूसरा देश चाह कर भी इनके विरूध्द वह सैन्य कार्यवाही न कर सकेगा जो अभी तक उसके लिए संभव है । इनके मारे जाने पर विश्व समुदाय की प्रतिक्रिया उसके पक्ष मे जायेगी ।
आज पूरा विश्व आतंकवाद के जिस चेहरे को देख रहा है वह आने वाले कल मे और भी भयावह होगा लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि अभी भी बहुत से देश इसके जहर को या तो समझ नहीं पा रहे हैं या फिर राजनैतिक व धार्मिक कारणों के चलते समझना ही नहीं चाहते । वैसे भी अगर आतंकवाद के इतिहास पर नजर डालें तो शुरूआती दौर में कुछ देशों के निहित स्वार्थों के चलते ही आतंकवाद का प्रसार हुआ था । यह दीगर बात है कि अब अपने ही हितों के लिए खडा किया गया यह दैत्य पूरी दुनिया के वजूद के लिए ही खतरा बन रहा है ।
दर्-असल सत्तर व अस्सी के दशक में दुनिया के कई देश अपने निहित स्वार्थों के लिए आतंकवाद को बढावा देते आये थे और अपने को बडी चालाकी से इससे अलग रखने में भी सफल रहे थे । दूसरे देशों में अस्थिरता पैदा करने के लिए आतंकवाद का सहारा लिया जाता रहा । कई ऐसे देश रहे जिन्होने आतंकवादी संगठनों को बाकायदा सुविधाएं उपलब्ध कराईं और दूसरे राष्ट्रों के विरूध्द उकसाने का काम किया ।
इस संदर्भ में फिलिस्तीनी मुक्ति मोर्चे ( पी.एल.ओ.) को ही लें । यह संगठन 1964 में फिलिस्तीन लोगों को एक स्वतंत्र फिलिस्तीन राज्य के निर्माण हेतु बनाया गया था । उसे तत्कालीन कई आतंकवादी संगठनों का समर्थन प्राप्त था । उस दौर में एक और संगठन था लेबनानी सशस्त्र क्रांतिकारी ग्रुप । इसकी शुरूआत 1979 में हुई थी । अमरीका इजराइल और फ्रांसीसी सशस्त्र सेवाओं की दासता से मुक्ति पाने के लिए तथा फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना हेतु यह संगठन बनाया गया था । इस संगठन का संबध भी कई आतंकवादी संगठनों से रहा है । सीरिया सरकार का भी इसे परोक्ष समर्थन प्राप्त था ।
1975 मे गठित एक संगठन है सीक्रेट आर्मी फार द लिबरेशन आफ आर्मीनिया । इस संगठन का उद्देश्य रहा है प्रथम विश्व युध्द के समय आर्मीनियाई लोगों के सामूहिक हत्याकांड की जिम्मेदारी तुर्की दवारा स्वीकार कराने हेतु उस पर दबाव डालना । यह आज भी सक्रीय है । इसी तरह 1970 मे गठित एक संगठन है जैपनीज रेड आर्मी । इसका उद्देशय रहा है जनता का जनतंत्र स्थापित करना । इसे लीबिया , उत्तरी कोरिया जैसे अनेक देशों का समर्थन मिलता रहा ।
दक्षिण अफ्रीका में जातीय राजनीति के विरूध्द एक वर्गविहीन सरकार की स्थापना करने के उदेश्य से बनाया गया संगठन ' अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस ' भी काफी चर्चित रहा । इसे उस दौर में कई देशों का परोक्ष समर्थन प्राप्त था । इसी तरह कई इस्लामिक आतंकवादी संगठन भी समय समय पर आतंक फैलाने का काम करते रहे । ओसामा बिन लादेन का ' अल कायदा ' तो आतंक का एक नया चेहरा बन कर उभरा । इसके अलावा ' सिमी ' जमात-ए. इस्लाम  और इससे जुडे अन्य संगठनों ने आतंक की एक नई कहानी लिखी जो अब भी जारी है ।  भारत मे भी कई इस्लामिक आतंकवादी संगठन आतंक फैलाते रहे हैं ।
दर-असल अपने अपने राजनीतिक हितों के लिए प्र्त्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन देने का परिणाम यह निकला कि पूरे विश्व में आतंकवाद का एक जाल सा बिछ गया और समय के साथ इन सभी संगठनों के उद्देश्य भी बदलते चले गये । अब इनसे मुक्त हो पाना मुश्किल लग रहा है । लेकिन यह असंभव भी नही है । इसके लिए जरूरी है कि विश्व राजनीति मे कथनी और करनी में फर्क न हो । मौजूदा इस्लामिक संगठन के संदर्भ में थोडा राहत देने बाली बात यह है कि खाडी देश अब इस खतरे को महसूस करने लगे हैं । यह देश अमरीका का साथ देने को तैयार हो गए हैं ।
अब यह जरूरी हो गया है कि सभी देश ऐसे खतरनाक मंसूबों के विरूध्द एक्जुट होकर सामने आऐं अन्यथा जब पांच साल के मासूम भी बंदूक लेकर धर्म के नाम पर खून खराबे के लिए आने लगेंगे तो पूरी दुनिया का वजूद ही खतरे में पड जायेगा । इस भयावह खतरे को हर कीमत पर यहीं पर रोकना बेहद जरूरी है ।