Friday, 24 October 2014

हिमालय क्षेत्र के जंगलों से लुप्त होती जडी-बूटियां

           

( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र आदिकाल से अपने प्राकृतिक संसाधनों की द्र्ष्टि से समृध्द रहा है | यहां के वन और पहाड तमाम खनिजों व बहूमूल्य लकडियों के लिए तो जाने ही जाते हैं इसके साथ ही दुर्लभ जडी-बूटियों का भी भंडार यही हिमालय क्षेत्र है | परन्तु सरकार की उदासीनता तथा किसी योजना के अभाव में जडी-बूटियों के इस भंडार का यथोचित उपयोग नही हो पाया है और न ही स्थानीय लोगों को कोई विशेष लाभ पहुंचा है |
     इधर कुछ वर्षों से प्राकृतिक द्र्ष्टि से संपन्न इस हिमालय क्षेत्र का चौतरफ़ा शोषण हुआ है | वनों के निर्मम दोहन से लेकर खनिज दोहन तक की लंबी कहानी है |
     इस शोषण के विरूध्द जाग्रत चेतना का प्रतीक रहे हैं चिपको आन्दोलन व दून घाटी से उपजी पर्यावरण की संगठित लडाई , जिसका अपना एक इतिहास रहा है | आज उत्तराखंड के नंगे पहाड और चूना खदानों से आहत हुई दून घाटी के अलावा जहां तहां खनिज दोहन के फ़लस्वरूप घायल पडी पहाडियां इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं |
     बात सिर्फ़ यहीं तक सीमित नही रही | अभी उत्तराखंड के खामोश पहाड इस त्रासदी से उबर भी न सके थे कि सरकारी तंत्र की मिली भगत व वन विभाग की लापरवाही के फ़लस्वरूप पहाड के वनों से जडी-बूटियों की तस्करी भी होने लगी | इसका दुखद पहलू यह भी रहा कि काफ़ी समय तक इस संपदा के महत्व और उपयोगिता पर किसी का ध्यान गया ही नही | यह ऐसे ही चलता रहा |
     इस प्रवृत्ति के फ़लस्वरूप आज पहाड के वनों में अनेक चिकित्सोपयोगी जडी-बूटियों का अस्तित्व ही संकट में पड गया है | यही नही, बहूमूल्य औषधियों की खोज में कई दुर्लभ किस्म की वनस्पतियों को भी नष्ट किया जा रहा है |
     दुर्भाग्यपूर्ण पहलू तो यह है कि कई बार अवैध चोरी के ऐसे मामले पकडे भी जाते रहे हैं लेकिन सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार के कारण कुछ नही हो पाता | आज भी उत्तराखंड के सुदूर जंगलों से जडी-बूटियों की चोरी बदस्तूर जारी है | इसके चलते तस्कर, ठेकेदार व शहरों के कुछ आयुर्वेदिक दवा कंपनियों के मालिक अपनी जेबें भर रहे हैं |
     यहां के अनेक स्थलों पर औषधियों का अथाह भंडार है | तुंगनाथ, मलारी, पवाली, बिनसर, डांडा क्षेत्र, द्रोणागिरी पर्वतमाला, टोंस घाटी क्षेत्र व मुन्स्यारी, नंदकोट आदि स्थानों पर अनेक दुर्लभ व बहूमूल्य जडी-बूटियां मिलती हैं | इसके अतिरिक्त तमाम रोगों में लाभकारी पहाडी फ़ल जैसे काफ़ल, किंगोड, हरड, रीठा, बेडू, हिसर तो लगभग पूरे उत्तराखंड में मिलते हैं | लेकिन आज यहां से इनका अवैध व्यापार हो रहा है | यही चीजे मैदानी शहरों मे कई गुना दामों पर बेची जा रही हैं |
     लाइलाज समझी जाने वाली अनेक बीमारियों में काम आने वाली जडी-बूटियों की इस क्षेत्र मे भरमार है | दमा, गठिया व उदरशूल के लिए तो यहां अनेक प्रभावकारी औषधि पौधे बहुतायत मे मौजूद हैं | सर्पदंश व अन्य किसी भी तरह के विष मे काम आने वाली औषधियां भी इस हिमालय क्षेत्र में मिलती हैं | परन्तु यहां के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जो शोषण की प्रवत्ति पनपी है उससे इन जडी-बूटियों का अस्तित्व ही खतरे में पड गया है |
     कभी मंदाकनी घाटी मे सर्पगंधा व मृत संजीवनी बहुतायत में मिलती थी लेकिन आज बहुत तलाशने पर ही इनके दर्शन होते हैं | इसी तरह ब्रहमकुमारी, इसरमूल, वसींगा तथ अपराजिता आदि औषधियां भी संकट के दौर से गुजर रही हैं| शक्तिवर्धक कई औषधियां तो अब लुप्त होने की कगार में हैं | इन जडी-बूटियों का महत्व इस बात से ही पता चल जाता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा मे सर्पगंधा, मृत संजीवनी व अपराजिता जैसी औषधियों का कोई विकल्प नही है |
     हिमालय क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधियों का स्थानीय लोगों के जीवन से गहरा संबध रहा है | आज भी सुदूर क्षेत्रों में लोग इन्हीं जडी-बूटियों से तमाम रोगों का इलाज स्वयं कर लेते हैं | सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत कम है जो हैं भी वह काफ़ी दूर | ऐसे में यह औषधियां ही इनके काम आती हैं | पहाड की पुरानी पीढी को इन औषधियों का अच्छा ज्ञान था लेकिन समय के साथ यह परंपरा भी खत्म हो रही है |
     आज चिंताजनक यह है कि हमारी गलत नीतियां व उपेक्षा से यह भंडार खतरे मे है | एक तरफ़ सरकार उदासीन है तो दूसरी तरफ़ स्वार्थी तत्व इन बहुमूल्य औषधियों का उपयोग अपने हित मे करने लगे हैं | कुल मिला कर वर्षों से संभाली यह धरोहर अब संकट के दौर से गुजर रही है |
     आज जरूरत इस बात की है कि हिमालय के इस क्षेत्र मे पायी जाने वाली इन जडी-बूटियों का योजनाबध्द अध्ययन व शोध हो तथा इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वन कानूनों मे भी परिवर्तन किया जाए जिससे इनके अवैध व्यापार को सख्ती से रोका जा सके | अगर समय रहते यह नही किया गया तो एकदिन हिमालय क्षेत्र में औषधियों का यह भंडार पूरी तरह रिक्त हो जायेगा |
    
    

     

Tuesday, 21 October 2014

अब महज दीवाली पर है कौडियों का मोल




( L.S. Bisht ) - साल-दर-साल बढती आधुनिकता के बाबजूद तीज-त्योहारों से जुडी अनेक परंपराओं का स्वरूप बहुत बदला नही है । यह माना जाता है कि दीवाली की रात लक्ष्मी घरों में आती है इसलिए आज भी लक्ष्मी के स्वागत के लिए लोग घर के बाहर दीये जलाते हैं । कुछ ऐसी ही आस्थाओं का जुडाव सदियों से रहा है ।
आज बेशक कौडी का कोई मोल न हो लेकिन कभी पूरे देश में कौडी का ही बोलबाला था । एक समय था जब देश में कोई भी आर्थिक लेनदेन इसके बिना संभव ही नही था । आज भी कौडी को लक्ष्मी का प्रतीक समझा जाता है । यही कारण है कि बंगाल में लक्ष्मी पूजन पर अब भी कौडियों से भरी टोकरी की पूजा की जाती है । इसमें कंघी, तेल, इत्र टीका तथा काजल आदि चीजें भी रखी जाती हैं।इसे लक्ष्मी की टोकरी माना जाता है ।
देश के कुछ क्षेत्रों में विशेष रूप से उत्तर प्र्देश, राजस्थान आदि मे दीपावली पर दीये जलाते समय दीपक में कौडी भी डाली जाती है । घर के आंगन में कौडी डाला हुआ दीपक पूरी रात जलता रहता है । धंनतेरस के दिन इसका विशेष महत्व है । दीयों मे रखी गयी इन कौडियों को बच्चे अवसर पाकर उठा ले जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि जेब में इन्हें रखने से धन की वृध्दि होती है । जुआ खेलने वाले भी इन्हें जेब में रखना नहीं भूलते ।
गोवर्धन पूजा मे भी कौडियों का महत्व है । पूजा के लिए बनाए जाने वाले पर्वत की आकृति को फूल-पत्तों व अन्य चीजों के अतिरिक्त कौडियों से भी सजाया जाता है । यही नहीं, विवाह अवसर पर जब वधू के हाथों में डोरा-कंगन बांधे जाते हैं तब उनमें कौडी भी पिरोई जाती है । किसी नये मकान के निर्माण के समय भी राई, लोहे का छ्ल्ला और कौडी बांधी जाती है । माना जाता है कि ऐसा करने पर मकान दुष्ट आत्माओं से मुक्त रहेगा ।
मनोरंजन के एक साधन रूप मे चौपड खेलंने की एक पुरानी परंपरा रही है । ऐतिहासिक उल्लेखों से पता चलता है कि मन बहलाने के लिए न सिर्फ राजा-महाराजा अपितु बेगमें भी चौपड खेलती थीं । कौडियों के उपयोग का प्रमाण हमें खुदाई से प्राप्त अवशेषों में भी मिलता है । सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से प्राप्त वस्तुओं में कौडियां भी प्राप्त हुई हैं ।
कौडियां कई प्रकार की होती हैं । लेकिन मुद्रा रूप मे मात्र दो प्रकार की कौडियों ही चलती थीं । पहली मनी कौडी और दूसरी प्रकार की कौडियां आकार मे छोटी,गोल और चिकनी होती हैं । भारत और आसपास के देशों मे इन्हीं का चलन था ।
इन कौडियों ने संसार के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था व सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इनके महत्व का पता इस बात से ही चल जाता है कि जब धातु के सिक्के चलने लगे तब भी कौडियों का प्रचलन आमजन के बीच चलता रहा । 1930 के आसपास दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों मे एक पैसा सौलह कौडियों के बराबर था ।
बहरहाल अब जमाना बहुत आगे निकल आया है । पूरे देश में रूपया भारतीय मुद्रा के रूप मे विनिमय का माध्यम बना हुआ है । मुद्रा के अलावा सोना व चांदी व्यक्ति की हैसियत का प्रतीक है । ऐसे मे कौडी का आर्थिक क्षेत्र मे कोई दखल नहीं रह गया है । अलबत्ता इसका धार्मिक महत्व बरकरार है और इसीलिए दीपावली पर कौडियों की तलाश शुरू हो जाती है । लेकिन यह महत्व भी कब तक बना रहेगा पता नहीं 

Monday, 20 October 2014

त्योहार पर हावी होता बाजार

    

(L.S. Bisht ) -     वर्षा ॠतु की विदाई के साथ हरी- भरी प्रकृति और शीत ॠतु की सुनाई देने वाली दस्तक के बीच त्योहारों का जो सिलसिला शुरू होता है वह शीत ॠतु की विदाई के साथ ही खत्म हो पाता है | लेकिन वक्त के साथ हमारे इन त्योहारों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है | सही अर्थों में यह बदलता स्वरूप हमें त्योहार के सच्चे उल्लास से कहीं दूर ले जा रहा है |
     अगर थोडा पीछे देखें तो पता चलता है कि कुछ समय पहले तक दीपावली की तैयारियां महीना भर पहले से ही शुरू हो जाया करती थी | महिलाएं दीवारों, दरवाजों और फ़र्श को सजाने का काम स्वयं करती थीं | पूरा घर अल्पना व रंगोली से सजाया करतीं लेकिन आज कहां है हाथों की वह सजावट | बडे उत्साह के साथ दीये खरीदे जाते | उन्हें तैयार किया जाता और फ़िर तेल और बाती डाल कर उनसे पूरे घर को दुल्हन की तरह सजा दिया जाता था | लेकिन अब किसे है इतनी फ़ुर्सत | बिजली के रंगीन बल्बों की एक झालर डाल सजावट कर दी जाती है | लेकिन कहां दीये की नन्ही लौ का मुण्डेर-मुण्डेर टिमटिमाते जलना और कहां बिजली के गुस्सैल बलबों का जलना- बुझना | परंतु यही तो है बदलाव की वह बयार जिसने इस त्योहार के पारंपरिक स्वरूप को डस लिया है | यही नही, अब कहां है पकवानों की वह खुशबू और खील, गट्टों से भरी बडी-बडी थालियां जो बच्चों को कई कई दिन तक त्योहार का मजा देते थे |
     दर-असल आज हमारे जीने का तरीका ही बदल गया है | इस नई जीवन शैली ने हमें अपने त्योहारों मे निहित स्वाभाविक उल्लास से काट दिया है | अब तो लोग दीपावली के दिन ही पटाखे और मिठाइयां खरीदने दौडते हैं | मिठाई भी ऐसी कि चार दिन तक रखना मुश्किल हो जाए |
     खुशियों का यह पर्व अब फ़िजूलखर्ची का पर्व भी बन कर रह गया है | शहरों मे बाजार ह्फ़्ता भर पहले से ही जगमगा उठते हैं | चारों ओर तामझाम और मंहगी आधुनिक चीजों से बाजार पट सा जाता है | महंगी मिठाइयां, मेवे, गिफ़्ट पैक, खेल-खिलौने, चांदी-सोने की मूर्तियां और सिक्के और भी न जाने क्या-क्या | इन सबके बीच दीपावली से जुडी पारंपरिक चीजें धीरे-धीरे गायब हो रही हैं |
     पारम्परिक आतिशबाजी का स्थान ले लिया है दिल दहला देने वाले बमों और पटाखों ने | एक से बढ कर एक महंगे पटाखे | हर साल करोडों रूपये के पटाखे दीपावली के नाम फ़ूंक दिए जाते हैं | सरकार और गैर सरकारी संगठनों की तमाम अपीलें भुला दी जाती हैं | बल्कि अब तो मुहल्ले स्तर पर आतिशबाजी की होड सी लगने लगी है कि कौन कितने तेज और देर तक आतिशबाजी कर सकता है | यह एक तरह से पटाखों की नही बल्कि दिखावे की होड है जिसे बाजार संस्कृति ने विकसित किया है |
            कुछ ऐसा ही बदल गया है इस दिन घर-मकान की सजावट का स्वरूप | अब दीये की झिलमिलाती बती का स्थान ले लिया है बिजली की सजावट ने | किस्म किस्म की लकदक झालरें और सजावटी कलात्मक मंहगी मोमबत्तियां | बेचारे मिट्टी के दियों का कोई पुरसाहाल नहीं | कुछ तो तेल महंगा और कुछ बदली रूचियों व अधुनिकता की मार |
     दीपावली पर उपहार देने की भी परम्परा रही है | लेकिन उपहार व तोहफ़ों का यह स्वरूप भी मिठाई अथवा खील बताशों तक सीमित नहीं रहा | सजावटी घडी, चांदी के खूबसूरत सिक्के, कलात्मक मूर्तियां व गहने, डिब्बाबंद मेवे और भी तमाम चीजें जुड गई है उपहार-तोहफ़ों से | यही नही, विदेशी शराब की बोतलों को भी उपहार मे देने की संस्कृति तेजी से विकसित हुई है | विदेशी चाकलेट के महंगे गिफ़्ट पैक भी उपहार मे दिये जाने लगे हैं | विज्ञापन संस्कृती ने इसकी जडें जमाने मे मह्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है |
     कुल मिला कर देखें तो इस त्योहार पर जो उत्साह, उल्लास कभी हमारे दिलो-दिमाग में बरबस घुल जाया करता था, अब चोर दरवाजे से बस एक परम्परा का निर्वाह करते हुए आता है | सच तो यह है कि त्योहार के नाम पर हम अपने संस्कारों व परम्परा का निर्वाह भर कर रहे हैं और वह भी इसलिए कि सदियों से पोषित विचारों से हम अपने को एक्दम से अलग नहीं कर पा रहे हैं | आधुनिकता और परंपरा के बीच हम संतुलन बनाने की जिद्दोजहद मे में उलझे हुऐ हैं | महंगे होते इस त्योहार के साथ मध्यम वर्ग तो येन-केन अपने कदम मिलाने मे समर्थ हो पा रहा है लेकिन कामगारों से पूछिए कि महंगा होता यह त्योहार उनकी जिंदगी को कितना छू पा रहा है | उनके चेहरे की मायूसी बता देगी कि रोशनी का यह त्योहार बदलते स्वरूप में उनकी अंधेरी जिंदगी के अंधेरों को कहीं से भी छू तक नहीं पा रहे हैं |
     सच् तो यह है कि अपने अपने बदल रहे चरित्र में यह रोशनी का पर्व सामर्थ्यवान लोगों के लिए धूम-धडाके, फ़ूहड नाच-गाने, होटलों के हंगामे और हजारों लाखों के जुआ खेलने का त्योहार बन कर रह गया है | लेकिन तेजी से आ रहे बदलाव के बाबजूद एक बडा वर्ग है जो अपने तरीके से निश्छ्ल खुशी के साथ इसे मना रहा है | यह दीगर बत है कि उसके सांस्कृतिक मूल्य भी जमाने की हवा से अछूते नही रहे | फ़िर भी इस पर्व से जुडे उसके मूल संस्कार बहुत बदले नही हैं | आज भी वह घर आंगन की झाड-बुहार करने में बहुत पहले से ही व्यस्त हो जाता है | मिठाई खरीदना और मित्र-रिश्तेदारों में बांटना वह नही भूलता | इस अवसर पर बच्चों के लिए नये कपडे खरीदना भी उसकी परम्परा का हिस्सा है |
     बहरहाल तेजी से बदल रहा है दीपावली का स्वरूप | लेकिन जिस तरह से ह्मरी आस्था से जुडे इस पर्व का सांस्कृतिक स्वरूप बिगड रहा है, उसे अच्छा तो नही कहा जा सकता | धन-वैभव, सामर्थ्य प्रदर्शन, चकाचौंध, दिखावा व स्वार्थ की जो प्रवत्ति तेजी से विकसित हो रही है इससे तो इस पर्व का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाऐगा | दूसरे पर्वों व उत्सवों की तरह इसे तो एक त्योहार की तरह ही हमारी जिंदगी से जुडना चाहिए |

    

     

Thursday, 16 October 2014

मानवीय संवेदनाओं पर सवाल उठाती मौतें


[ एल.एस. बिष्ट ] - आज अगर हम अपने आसपास हो रही घटनाओं से मुंह न मोडें तो यह बात पूरी तरह से साफ हो जाती है कि विकास व उन्नति की तेज धारा के साथ बहते हुए हम कहीं न कहीं मानवीय संवेदनाओं से कटते जा रहे हैं । यही नही, विकास की सीढियां चढते समाज का ताना-बाना भी कुछ इस तरह से उलझने लगा है जिसमें जिंदगी ही बोझ लगने लगती है ।यही कारण है कि रोज सुबह आंगन में गिरने वाले अखबार भी चीख चीख कर हमें यह बताने की कोशिश करता है लेकिन हम हैं कि राजनीति और अर्थशास्त्र की खबरों से नजर उठा ही नहीं पाते ।
आज किसी भी अखबार मे राजनीति व चुनावी खबरों के बीच ऐसा बहुत कुछ भी है जिस पर सोचा जाना चाहिए लेकिन यह खबरें बिना किसी का ध्यान अपनी ओर खींचे चुपचाप बासी हो जाती हैं और हम आसानी से भूल जाते हैं कि ऐसा कुछ भी हमारे आस-पास घटित हुआ था ।
आज के समाचार पत्र में छ्पी कुछ ऐसी ही खबरें इस तरह से हैं । एक खबर के अनुसार गीतकार संतोष आनंद के बहू-बेटे ने कोसी कलां में इंटरसिटी के आगे कूद कर अपनी जान दे दी । सुसाइड नोट के अनुसार उन्हें करोडों रूपये के हेरा फेरी मामले में फंसाया गया था । एक दूसरी खबर के अनुसार आगरा के एक डाक्टर की प्रेम कहानी का दुखद अंत हुआ । ढाई साल पहले प्रेम विवाह हुआ और फिर शादी । लेकिन मनमुटाव के चलते डा. दिशा मायके मे रहने को मजबूर हो गईं और फिर वहीं फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली ।
ऐसी ही एक और खबर के अनुसार ट्रेन से कट कर तीन दोस्तों ने जान दे दी । बांदा के इन तीन युवकों ने संपर्क क्रांति एक्सप्रेस के सामने लेट् कर सामूहिक रूप से  आत्महत्या की । यही नहीं, शाहजहांपुर में प्रेमी युगल ने भी खुदकुशी कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी । पहले किशोरी ने आत्महत्या की फिर गम में प्रेमी ने भी मौत का रास्ता चुनना बेहतर समझा । माता-पिता उनके आपसी रिश्तों के विरोधी थे ।
यह खबरें तो बानगी भर हैं । दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि देश में खुशहाल होते परिवेश के बीच इन खबरों की संख्या में निरंतर वृध्दि हो रही है । एक ही शहर में एक ही दिन में कई लोग जिंदगी से ऊब जिंदगी को अलविदा कहने को मजबूर हो जाते हैं । लेकिन न तो किसी अखबार में इन मानवीय घटनाओं पर संपादकीय लिखा  जाता है और न ही उन्हें प्रमुखता दी जाती है । बस किसी कोने मे एक छोटी सी खबर बन कर रह जाती है इंसानी  जिंदगी ।
दर-असल आज की उपभोक्ता संस्कृति व हमारी आत्मकेन्द्रित जीवन शैली  हमें मानवीय संवेदनाओं से कहीं दूर ले गई है । हमें  या तो सरकार, शासन व चुनाव की खबरें रास आती हैं या फिर बाजार मे आने वाले नित नये उपभोक्ता उत्पादों की । कहां क्या सस्ता बिक रहा है, यह हमारी सोच की प्राथमिकताओं मे है । सच तो यह है कि हमारी चिंताओं , सरोकारों और सोच का दायरा सिमट कर रह गया है ।
इस नजरिये से देखें तो मीडिया कहे जाने वाला भोंपू भी राजनीतिक खबरों, सेक्स स्केंडलों और विज्ञापनों की तिलस्मी दुनिया तक सीमित होकर रह गया है । राजनीतिक उठा-पटक व बलात्कार जैसे विषयों पर दिन-दिन भर चौपाल लगाने वाला मीडिया कभी भी मानवीय जीवन की त्रासदायक घटनाओं पर बहस करवाता नहीं दिखता । शायद फांसी पर लटकते लोग, पटरियों पर कटते इंसान कोई सवाल नहीं उठाते या फिर मानवीय जीवन के यह अंधेरे टी.आर.पी नही बढाते । बात कुछ भी हो लेकिन सामाजिक -पारिवारिक दवाबों को न झेल पाने की यह नियति और हमारी खामोशी या बेखबरी आज के समाज के चरित्र पर सवाल तो उठाती ही हैं ।
दर-असल गौर से देखें तो बीते दौर की तुलना मे हमने विकास और समृध्दि की लंबी छ्लांग लगाई है । हमारी जिंदगी अभावों के अंधेरे से निकल सुविधाओं की रोशनी से सराबोर हुई है । लेकिन इस समृध्दि के गर्भ मे ही हमारी परेशानियों, उदासियों और अवसाद के बीज निहित हैं । वस्तुत: बीते सालों मे हमने विकास का जो ढांचा स्वीकार किया उसने सपनों, आकांक्षाओं और भौतिक सुविधाओं की ललक तो जगाई लेकिन समय के थपेडों को सहने व झेलने के मूल्य विकसित नहीं  किए । यही कारण है कि चाहे मामला प्यार की कोमल भावनाओं का हो या फिर वैवाहिक जीवन की उलझनों का या फिर आर्थिक उतार-चढाव का, एक छोटा सा अंधड हमारी जडों को हिला पाने मे सफल हो जाता है । किन्हीं कमजोर क्ष्णों मे हम जिंदगी को अलविदा कहने को ही बेहतर विकल्प मान बैठते हैं । नित बढती यह घटनाएं विकास और समृध्दि के स्वरूप पर कुछ बुनियादी सवाल उठा रही हैं लेकिन हम हैं कि राजनीति व बाजार संस्कृर्‍ति से इतर कुछ देख पाने मे असमर्थ से होते जा रहे हैं ।
सवाल यही है कि आखिर हम इन घटनाओं मे निहित बेबसी, लाचारगी व उलझनों पर कब सोचना शुरू करेंगे । कब हम उन बातों पर चर्चा करने की जहमत उठायेंगे जो जिंदगी की बुनियाद को ही खत्म करने पर आमादा हैं । क्यों एक हंसती-खेलती जिंदगी पल तो पल में मौत के आगोश मे चली जाती है । कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा है जिससे जिंदगी हार मान  बैठती है । आज इन सवालों पर न सोचा गया और मीडियाई भाषा में कहें तो  इन्हें महज एक हादसा मान बैठे तो कोई संदेह नही कि कल का अंधेरा कुछ ज्यादा स्याह होगा । 

Friday, 10 October 2014

लापता बच्चों की है एक अंधेरी दुनिया

     

 ( L.S. Bisht ) -“ बबलू तुम जल्दी घर आ जाओ, कोई तुम्हें कुछ नही कहेगा | पैसे नहीं हैं तो जल्दी लिखो, पापा आ जायेंगे |”
एक दूसरा विज्ञापन – “ राजू बेटा तुम्हारी मां तुम्हारे बिना रो-रो कर पागल हो गई है | वह तुम्हें ही याद कर रही है , घर लौट आओ | “
इस तरह के विज्ञापन रोज पत्र-पत्रिकाओं मे छ्प रहे हैं | दूरदर्शन और दूसरे माध्यमों मे भी इन खोये हुए बच्चों के बारे मे सूचनाएं प्रसारित की जाती हैं | लेकिन कितने अपने घर वापस लौट पाते हैं, पता नहीं | अलबत्ता ऐसे विज्ञापनों की संख्या निरन्तर बढती जा रही हैं |
     इन बच्चों के मामले में एक दुखद पहलू यह भी है कि लापता होने की कोई कानूनी परिभाषा भी नही है | प्रत्येक राज्य अपने नियम-कानूनों का पालन करता है | व्यवस्थित व नवीनतम आंकडों का भी नितांत अभाव है | दर-असल इस पहलू को  कभी गंभीरता से लिया ही नही गया | खोये या लापता हुए यह बच्चे किस दुनिया में चले जाते हैं , किस हाल में रहते हैं, क्या करते हैं, इन सवालों से मानो किसी को कोई लेना देना ही नहीं |
     अभी हाल में उच्चतम न्यायलय ने लापता बच्चों के मामले मे अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अमीर घरों के बच्चों को तलाशने में पुलिस तत्परता दिखाती है लेकिन गरीब बच्चों को नहीं | इसके पूर्व 5 फ़रबरी,2013 में भी लापता बच्चों को खोजे जाने के मामले में सरकार के रवैये की आलोचना की थी और कहा था कि लगता है इन बच्चों की किसी को चिंता नहीं है | यही नही,  17 मार्च 2012 को भी एक जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायलय ने केन्द्र व राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी किया था तथा यह भी सलाह दी थी कि गायब हुए बच्चों को तलाशने के लिए सरकारें आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करे |
     जुलाई 2014 को गृह मंत्रालय की तरफ़ से संसद मे जो आंकडें पेश किये गये थे उसमें बताया गया था कि देश में 2011 से जून 2014 के बीच 3.25 लाख बच्चे देश मे लापता हैं | औसत रूप से प्रतिवर्ष 1 लाख बच्चे लापता हो रहे हैं |
     इस संदर्भ में एक गौरतलब तथ्य यह भी है कि ऐसे मामलों में अधिकांश में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज ही नही की जाती | सिर्फ़ लापता हुए लोगों की लिस्ट में नाम दर्ज कर लिया जाता है और पुलिस स्टेशनों को फ़ोटो भेज दी जाती है | प्रथम सूचना रिपोर्ट तब दर्ज की जाती है जब उसे अपहरण या फ़िरौती का केस बनाया जाए | इस पुलिसिया अंदाज ने इस समस्या को और भी अधिक गंभीर बना दिया है |
     घर से बेघर हो लापता होने वाले इन बच्चों के लिए कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है | कुछ गैर सरकारी संस्थाओं दवारा किए गये अध्यनों में जो कारण सामने आए हैं उनमें सबसे प्रमुख है गरीबी | कुछ बच्चों के माता-पिता स्वयं ही उन्हें छोड देते हैं क्योंकि वह उनका पालन नहीं कर् सकते | इसके अलावा कुछ बच्चे यात्रा के दौरान माता-पिता से बिछुड जाते हैं और फ़िर गलत लोगों के हाथों में चले जाने के कारण कभी मिल नहीं पाते |
     एक बहुत बडी संख्या उन बच्चों की भी होती है जो घर के माहौल से स्वयं ही भाग जाते हैं और फ़िर कभी लौट कर नही आ पाते | दर-असल बच्चों में प्यार पाने व स्नेह की मूल प्रवृत्ति होती है परंतु जब उन्हें प्यार नही मिलता तो अक्सर छोटी सी बात पर वे घर छोड देते हैं | एक और बडा कारण है बच्चों को बहुत ज्यादा मनोवैज्ञानिक दवाब मे रखा जाना | जिसका परिणाम यह होता है कि उनके अंदर एक डर की भावना घर कर जाती है | इस तरह के बच्चे अक्सर परीक्षा में पास न हो पाने की स्थिति में घर से भाग जाना बेहतर समझते हैं | वह माता-पिता के सामने आने की हिम्मत नही जुटा पाते | परीक्षाओं के परिणाम निकलने के बाद अक्सर इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं | कुछ बच्चे तो दो चार घंटे में या दो-एक दिन बाद घर लौट आते हैं लेकिन कुछ कभी वापस नहीं आ पाते |
     पारिवारिक खराब माहौल भी इस समस्या का एक बडा कारण है | दर-असल पारिवारिक सबंधों का बच्चों पर सीधा प्रभाव पडता है | बल्कि बच्चे इस सबंध में अधिक संवेदनशील पाये गये हैं | घर में माता-पिता के मध्य कलह रहने से उसका दुष्प्रभाव बच्चों पर भी पडता है, किशोर उम्र के बच्चे अप्ने को ऐसे माहौल मे कटा सा महसूस करने लगते हैं तथा घर से भाग जाने की भावना उनमें जाग्रत होने लगती है | कमजोर क्षणों मे वह ऐसा कर भी बैठते हैं |
     इन पारिवारिक व सामाजिक कारणों के अलावा लापता हुए बच्चों में एक बडी संख्या उन बच्चों की भी है जिन्हें असमाजिक तत्व अपने हितों के लिए अपहरण कर लेते हैं या पहले बहला फ़ुसला कर और बाद में हिंसात्मक तरीके अपना कर अपने वश में कर लेते हैं | इन बच्चों को गैरकानूनी कामों मे इस्तेमाल किया जाता है |
     कई और कारणों से भी असमाजिक तत्व कम उम्र के बच्चों का अपहरण करते हैं | गायब किए गये बच्चों मे लडकियों को देह व्यापार के काम मे इस्तेमाल किया जाता है और इसके साथ ही बाल पोर्न कि लिए भी इनका इस्तेमाल किये जाने लगा है |यही कारण है कि लापता हुए बच्चों मे 65% की उम्र 13 से 18 के बीच होती है | भारत में कुछ संगठित गिरोह ऐसे बच्चों को भीख मांगने के काम मे लगाने के लिए इनका अपहरण करते हैं | समय समय पर कई ऐसे मामले प्रकाश में आए हैं लेकिन इन्हें जड से खत्म नही किया जा सका |
     कारखानों मे मानव श्रम की अधिक मांग को देखते हुए इन बच्चों का उपयोग वहां किया जाने लगा है | छापों में ऐसे कई बच्चे बरामद भी हुए हैं | इधर कुछ समय से मानवीय अंगों की बढती मांग को देखते हुए कुछ लोग इन बच्चों का अपहरण कर इनके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की तस्करी भी करने लगे हैं | यह घिनौना व्यवसाय देश मे इधर कुछ समय से पनपा है और इसके लिए बच्चे सबसे आसान टारगेट सिध्द हुए हैं |
     यानी कुल मिला कर देखा जाए तो बच्चों की मासूम दुनिया का यह एक ऐसा  उपेक्षित पहलू है जिस पर कभी गंभीरता से सोचा ही नही गया | प्रतिवर्ष लाखों बच्चे लापता हो जाते हैं और इनकी एक बडी संख्या कभी लौट कर घर नही आ पाती | माता-पिता भी थक हार कर इसे अपनी नियती मान बैठते हैं या फ़िर किसी चमत्कारिक घटना की आस में दिन काटते रहते हैं | गुमशुदा की औपचारिक रिपोर्ट लिखने के बाद पुलिस भी ऐसे बच्चों को तलाशने का कोई गंभीर प्रयास नहीं करती और कुछ समय बाद फ़ाइल बंद कर दी जाती है | लाखों बच्चे कहां खो गये, यह जानने की जहमत कोई नही उठाता | विकास की सीढियां चढते इस देश मे इस पहलू को आखिर कब तक नजर-अंदाज किया जाता रहेगा | जरूरी है कि इसके लिए एक व्यवस्थित व आधुनिक तत्र विकसित किया जाए जो पूरी तरह से इस काम के लिए जवाबदेह हो तथा इस तंत्र पर प्रभावी नियंत्रण भी हो | इसमें कोई संदेह नही कि प्रशासनिक व कानूनी स्तर पर हमारे थोडे से गंभीर प्रयास लाखों बच्चों की दुनिया में फ़िर से उजाला बिखेर सकते हैं |

     

Thursday, 9 October 2014

उदार फैसलों ने बढाया पाकिस्तान का दुस्साहस




( L.S. Bisht ) - एक बार फिर पाकिस्तान के साथ सीधे टकराव की हालात बन रहे हैं । लेकिन ऐसा पहली बार भी नही है । दर-असल भारत और पाकिस्तान का जन्म ही विवाद और झगडे के गर्भ से हुआ । जिन्ना ने रातों रात अपने विचार बदल कर धार्मिक आधार पर अलग राष्ट्र के रूप मे पाकिस्तान की मांग न की होती तो आज दुनिया के मानचित्र पर पाकिस्तान नाम का राष्ट्र न होता । जब दो राष्ट्रो की जन्मकुंडली पर शनिग्रह हो तो उनके बीच नोंक झोक का होना स्वाभाविक ही है । 1947 से ऐसा ही हो रहा है । लेकिन यहां गौरतलब यह है कि दोनो राष्ट्रों के चरित्र, सोच और नीतियों में कोई समानता नही है ।
भारत अपने जन्म से ही एक उदार सोच वाले राष्ट्र के रूप में विकसित हुआ । अगर थोडा पीछे देखें तो विभाजन के समय होने वाले  साम्प्रदायिक हिंसा के संदर्भ में गांधी जी की उदार भूमिका पर आज भी सवाल उठाये जाते हैं । लेकिन वहीं सीमा पार से ऐसी किसी उदार सोच के स्वर नहीं सुनाई दिये थे । इसके फलस्वरूप देश मे एक बडा वर्ग आज भी गांधी जी की उस उदारता का पक्षधर नहीं दिखाई देता ।
इसके बाद तो पाकिस्तान और भारत का इतिहास युध्द और राजनीतिक विवादों का ही इतिहास रहा है । अभी तक दोनो देशों की सेनाएं चार बार रणभूमि में आमने सामने हो चुकी हैं । लेकिन इन युध्दों का और उस संदर्भ में हुए राजनीतिक निर्णयों का यदि बारीकी से पोस्टमार्टम करें तो यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि भारत ने यहां भी अपनी उदार सोच का खामियाजा भुगता है ।
आजादी के उपरांत जन्म लेते ही पाकिस्तान ने 22 अक्टूबर 1947 को कश्मीर पर कबिलाईयों के साथ मिल कर हमला किया । लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर दोनो देश युध्द विराम के लिए राजी हो गये । लेकिन चूंकि उस समय कश्मीर एक स्वतंत्र रियासत थी तथा तत्कालिन राजा हरि सिंह ने उसका विलय भारत के साथ स्वीकार नहीं किया था अत: जब तक भारतीय सेना कश्मीर बचाने के लिए पहुंचती, पाकिस्तान एक हिस्से में अपना कब्जा जमा चुका था । बाद मे विलय होने के बाद भी भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के सवाल पर कभी शोर नहीं मचाया ।
भारत के इस नरम रूख को भांपते हुए उसने 1965 में फिर हमला किया । इस बार भी झगडा कश्मीर को लेकर ही था । अप्रैल 1965 से लेकर सिंतबर 1965 के बीच चलने वाले इस युध्द का अंत भी विश्व बिरादरी के दवाब में युध्द विराम की घोषणा करने से हुई । इसी समय ताशकंद समझौता भी हुआ । इस समझौते के लिए तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्र्पति अयूब खान तुरंत राजी हो गये । दर-असल युध्द मे अपनी खस्ता हालत से वह परिचित थे । उन्हें डर था कि यदि यह समझौता न हुआ तो भारत युध्द मे कब्जा किये गये क्षेत्रों को वापस नहीं करेगा ।
दर-असल इस ताशकंद समझौते में भी हमेशा की तरह भारत को ही घाटे का समझौता करना पडा था । शास्त्री जी जैसे सरल व उदार प्रधानमंत्री अंतराष्ट्रीय राजनीति के खुर्राट लोगों के दवाब को न झेल सके तथा अनचाहे समझौता करना पडा था । कहा जाता है कि उसका दुख उन्हें इतना हुआ कि हार्ट अटैक से उनका वहीं देहांत हो गया ।
उस समय देश मे युध्द विराम किए जाने का तीखा विरोध भी हुआ था । दर-असल जिस समय यह युध्द विराम किया गया भारत युध्द में मजबूत स्थिति में था । पाकिस्तान की स्थिति काफी कमजोर पडती जा रही थी । लेकिन समझौते के तहत भारत को पीछे हटना पडा । तत्कालीन भारतीय सेना के कमांडरों को यह निर्णय जरा भी अच्छा नहीं लगा । उस स्थिति मे भारत दवारा स्वीकार किया गया युध्द विराम पाकिस्तान के पक्ष मे ही गया । यहां पर भी गौरतलब यह है कि भारत ने ही उदारता का परिचय देते हुए समझौते की शर्तों को स्वीकार कर लिया । आज तक ताशकंद समझौता भारत के दिल मे खटकता रहता है
लेकिन पाकिस्तान की फितरत बदलने वाली नहीं थी । भारत को चौथा युध्द 1971 मे करना पडा । वैसे तो शुरूआत में यह पाकिस्तान का सीधा हमला नही था लेकिन बाद मे हालात ऐसे बने कि दोनो देशों के बीच तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांगला देश को लेकर युध्द हुआ जो 13 दिनों तक चला । यह युध्द इतिहास का सबसे अल्पकालिक युध्द माना जाता है । भारत ने इन तेरह दिनों मे ही पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दिया । उसे इस युध्द मे शर्मनाक हार झेलनी पडी ।
16 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी जनरल नियाजी को समर्पण के द्स्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पडे । भारत ने 90,000 पाकिस्तानी सैनिकों को बंदी बनाया था । इसके बाद 1972 मे शिमला समझौता हुआ । पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी को स्वीकार करने के बदले में अपने युधबंदियों की रिहाई की मांग सामने रख दी जिसे भारत ने  स्वीकार कर लिया । लेकिन यहां वही कहानी दोहराई गई । युध्द में कब्जा की गई पश्चिम पाकिस्तान की 13000 किलोमीटर जमीन समझौते के तहत वापस कर दी गई । कहा जाता है कि भुट्टो के कहने पर भारत ने इस समझौते मे नरम रूख अपनाया ।  आशा की जानी चाहिए कि मौजूदा सरकार पिछली सरकारों की गलतियों को न दोहरा कर सख्त नीति का पालन करेगी । ताकतवर और दो टूक सैनिक कार्यवाही ही पाकिस्तान के लिए उपयुक्त है ।
बात यहीं खत्म नही होती । अटल जी के नरम रूख को देखते पाकिस्तान ने कारगिल पर कब्जा करने की पूरी कोशिश की लेकिन भारतीय सेना की वीरता के आगे वह इसमें सफल न हो सका । यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान के लिए सीधे बस सेवा शुरू करने वाले अटल जी ही थे । कुल मिला कर भारत को अपने उदार रवैये का हमेशा खामियाजा ही भुगतना पडा है । पाकिस्तान भारत के इस नरम और उदार सोच से अच्छी तरह वाकिफ है और इसीलिए उसका दुस्साहस बढता रहा है ।
लेकिन अब उसका सामना नेहरू , अटल या मनमोहन सिंह से नही है । मोदी सरकार पाकिस्तान के प्रपंचों से अच्छी तरह परिचित है और यह भी जानती है कि पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के लिए किस नीति की जरूरत है । पाकिस्तान के हुक्मरानों को इस बात का एहसास भी होने लगा है । यह अच्छी बात है कि मोदी सरकार ने अपनी सेना के हाथ बांधे नही हैं । हमारी सेना इसके लिये पूरी तरह से सक्षम भी है ।

Saturday, 4 October 2014

बदइंतजामी बुलाती है मौत




 ( L.S. Bisht ) -   दशहरा के अवसर पर पट्ना के गांधी मैदान में हुई भगदड मे कितने लोग मारे गये और कितने घायल हुए, यह सवाल इतना महत्वपूर्ण नहीं है | अगर मौतों की संख्या पर ही कुछ सोचा जाना जरूरी है तो यही कहा जा सकता है कि मरने वालों में इस बार भी अधिकांश महिलाएं व बच्चे ही हैं | दुखद तो यह है कि यह वही गांधी मैदान है जहां से आजादी से जुडे कई आंदोलन हुए | चंपारण आंदोलन तथा 1942 का भारत छोडो आंदोलन का भी यह मैदान गवाह बना है | जयप्रकाश नरायण ने 1974 में इसी मैदान से क्रांति की अलख जगाई थी | लेकिन 3 अक्टूबर की शाम को इस मैदान ने भयावह मौत का मंजर देखा |
     इस तरह के हादसों के कारणों की तह पर जाएं तो बदइंतजामी ही इसका एकमात्र कारण उभर कर सामने आती है | यह घटना इसी लापरवाही का परिणाम है | लेकिन इससे ज्यादा शर्मनाक मंजर तब देखने को मिलता है जब हमारे राजनेता ऐसी घटनाओं को लेकर बयानबाजी करने लगते हैं | मृतकों के परिजनों के साथ सहानुभूति व्यक्त करते हुए ऐसा कुछ कहने लगते हैं कि वह कोढ पर खाज का ही काम करता है | एक दूसरे पर आरोप लगाने की होड़ सी मच जाती है
     इस घटना का मूल कारण मेले मे फ़ैली यह अफ़वाह है कि कहीं पर बिजली का तार टूट कर गिर गया है | यह सुनते ही लोग जान बचाने के लिए भागने लगे और इस भगदड में महिलाएं और बच्चे मौत के  आसान शिकार बने | वह तेजी से दौड न पाने के कारण लोगों के पैरों तले कुचल कर मारे गये |
     लेकिन ऐसा नही है कि ऐसा पहली बार हुआ हो | हमारे तीर्थ स्थलों, धार्मिक स्थानों व धार्मिक आयोजनों पर पहले भी इस तरह की घट्नाएं कई बार हो चुकी हैं | अभी लगभग ऐसी ही घटना छ्ठ पूजा के अवसर पर हुई थी | उस समय भी भगदड में मरने वालों मे महिलाओं और बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा थी | लेकिन उस घटना से भी राज्य सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा और परिणामस्वरूप लगभग उसी तरह की बदइंतजामी के कारण यह हादसा हुआ |
     पिछ्ले वर्ष अक्टूबर में दशहरे के अवसर पर ही मध्यप्र्देश के दतिया जिले में ऐसी एक भगदड में 90 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी थी | इसमें 100 से ज्यादा लोग बुरी तरह घायल हुए थे | यहां पर लगभग 1,50,000 लोग रत्नागढ मंदिर मे द्शहरा मनाने आये थे |  नदी पर बना पुल जो मंदिर को जोडता है उसकी रैलिंग टूटने से अचानक भगदड मच गई | कुछ लोग पैरों के नीचे आने से कुचल कर मृत्यु का ग्रास बने और कुछ ने नदी मे छ्लांग लगा कर तैर न पाने के कारण डूब कर जलसमाधि ले ली | यह एक बेहद दर्दनाक हादसा था |
     अभी हाल में 25 अगस्त को मध्यप्रदेश में हजारों श्र्ध्दालु चित्रकुट क्षेत्र में कामतानाथ मंदिर मे इकट्ठे हुए थे | भीड़ काफ़ी ज्यादा थी और उस हिसाब से इंतजाम कम | अचानक कुछ लोग भीड़ के दवाब के कारण गिर पडे और फ़िर एक दूसरे पर गिरते ही चले गए | इस घटना मे भी 10 लोग मारे गये जिसमें 5 महिलाएं थीं | लगभग 60 लोग घायल हुए थे |
     इस घटना के कुछ समय पूर्व 10 फ़्ररबरी, 2013 को इलाहाबाद मे कुंभ मेले के अवसर पर रेलवे स्टेशन मे सीढीयों की रैलिंग टूटने से भगदड मची थी और यहां भी 36 लोगों को जिनमें 26 महिलाएं थीं अपनी जान गंवानी पडी | इस घटना के मामले में कुछ लोगों का मानना था कि पुलिस दवारा अचानक लाठी चार्ज करने से यहां भगदड हुई थी | लेकिन कारण कुछ भी रहे हों प्रशासनिक लापरवाही की कीमत लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पडी | तब तत्कालिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी ने भी बतौर दस्तूर घटना पर दुख जताया था जैसा कि हर ऐसी दुर्घटना के बाद होता है | लेकिन शायद ही आगे के लिए कुछ सोचा गया हो |
     इस तरह की य्ह चंद घटनाएं नहीं हैं | समय समय पर यह दुर्घटनाएं होती रही हैं | अप्रैल, 2010 में हरिदवार मे शाही स्नान के समय भी ऐसी ही भगदड में सात लोग मारे गये थे | नासिक में गोदावरी नदी के समीप  कुंभ मेले के अवसर पर भी भगदड में 40 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी थी और यहां भी लगभग 125 लोग घायल हुए थे | हरिद्वार की उस घटना को लोग अभी भूले नहीं हैं जब ब्रहमकुंड एक मृत्यु कुंड मे तब्दील हो गया था | 47 तीर्थयात्रियों की अकाल मौत हुई और सैकडों घायल हुए थे | 7 मार्च 1997 को अजमेर में दरगाह मे उर्स के अवसर पर हुई घटना को भी भुलाया नही जा सकता | देश विदेश के तमाम लोगों ने उस घटना को देखा था | उस समय वहां लगभग ढाई लाख लोग जमा थे | सच तो यह है कि ऐसी घटनाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त है |
     इन तमाम घटनाओं पर नजर डाले तो पता चलता है कि सभी दुर्घटनाएं मानवीय भूलों का परिणाम रही हैं | अक्सर भीड को देखते हुए स्थानीय प्रशासन जरूरी इंतजाम करने मे असफ़्ल रहता है | लाखों लोगों की भीड के लिए सुविधाजनक आवागमन जरूरी होता है | इसमे थोडी सी भी चूक दुर्घ\टना को न्योता दे सकती है | अधिकांश मामलों मे बडी भीड के प्रवेश व निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण दुर्घटनाएं हुई हैं | मंदिर या धार्मिक स्थ्ल के पास संकरे स्थान पर भीड. का उचित और प्रभावी नियंत्रण बहुत जरूरी है अक्सर इसमे चूक होने की संभावना बनी रहती है | कई दुर्घटनाएं इसी कारण हुई हैं विशेष कर हमारे प्राचीन धार्मिक स्थलों पर | पुलों पर भीड का दवाब ज्यादा न पडे इस पर पहले से ही सोचा जाना जरूरी है और इसके लिए वैक्ल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए |
     पटना मे हुए इस हादसे ने एक बार फ़िर सोचने को मजबूर कर दिया है | अब यह जरूरी है कि इस प्रकार के सार्वजनिक मेलों, उत्सवों तथा धार्मिक पर्वों पर सभी जरूरी सुरक्षा उपाय पहले से ही कर लिए जाएं | आवागमन की उचित व्यवस्था के साथ ही आपातकालीन व्यवस्था का होना भी जरूरी है | सबसे महत्वपूर्ण है भीड. का प्रभावी नियंत्रण तथा जरूरत पडने पर वैकल्पिक व्यवस्था का होना | हमें यह सीख लेनी ही होगी कि यह सभी घटनाएं बदइंतजामी व प्रशासनिक भूलों का ही परिणाम रही हैं | इन्हें आसानी से रोका जा सकता था | आगे ऐसा न हो इस पर गंभीरता से सोचा जाना जरूरी है तथा ऐसे अवसरों के लिए एक त्रुटिविहीन तंत्र विकसित किया जाना चाहिए |
      
    

     

Wednesday, 1 October 2014

कहां खो गया ट्रस्टीशिप का सपना




[ एल. एस. बिष्ट ] - आजादी और इसके आसपास की तारीखों से जुडी घटनाओं पर बहुत कुछ लिखा व कहा जाता रहा है । लेकिन दुर्भाग्य से बहुत सी बातें कई कारणों से अंधेरे में ही गुम होकर रह गई हैं । इस संदर्भ में गौर करें तो आज देश का बच्चा बच्चा गांधी जी के असहयोग, सत्याग्रह, अहिंसा व चरखा आदि से भली भांति परिचित है । लेकिन स्वतंत्र भारत के लिए गांधी जी का एक और सपना था जिसकी पूरी तरह से उपेक्षा कर दी गई । यह सपना था ट्र्स्टीशिप का । सिर्फ यही एक दर्शन था जिसे वह अपने जीवन काल में व्यवहारिक रूप न दे सके । शोषण मुक्त समाज से जुडे इस सपने को गांधीवादियों ने भी भुला दिया । आखिर भारतीय समाज के लिए क्या थी उनकी परिकल्पना, आज इस पर सोचा जाना चाहिए ।
दर-असल यह एक सपना ही नहीं बल्कि देश की भावी अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उनका आर्थिक दर्शन था । इसमें उन्होने शोषणमुक्त समाज की स्थापना के लिए व्यक्तिगत संपत्ति का विरोध किया था । उनका मानना था कि कोई भी धनी व्यक्ति संपत्ति का उतना ही भोग का अधिकारी है जितना देश के दूसरे लोगों को प्राप्त है । बाकी संपत्ति का उपयोग उसे दूसरों के लिए करना होगा ।
वे संपत्ति पर वंशागत अधिकार के भी विरोधी थे । वे यह मानते थे कि संपत्ति और मानव उपलब्धियों के सभी रूप या तो प्रकृति या फिर सामाजिक जीवन की देन हैं । इसीलिए वे किसी एक के न होकर पूरे समाज के होते हैं और उनका इस्तेमाल सभी के भले के लिए किया जाना चाहिए ।
दर-असल गांधी जी को शंका थी कि आजादी के बाद पूंजीवादी व्यवस्था पनप सकती है तथा करोडों लोगों को खुशहाली से वंचित किया जा सक्ता है । पश्चिमी देशों में पनपी पूंजीवादी व्यवस्था व शोषण से वे अच्छी तरह से परिचित थे । भारत में ऐसा न हो इसके लिए वे चिंतन करंने लगे थे ।
गुलामी के अंधेरे दिनों में जब वह आजादी की रोशनी के लिए संघर्ष कर रहे थे, उन्होने भावी भारत की तस्वीर का एक खाका खींचा था । देश की अर्थव्यवस्था कैसी होगी, इस बारे मे वे अफ्रीका प्रवास के दौरान ही सोचने लगे थे । उन्होने अपनी आत्मकथा में लिखा है  " गीता के अध्ययन के फलस्वरूप ' ट्र्स्टी ' शब्द का अर्थ विशेष रूप से समझ में आया । ट्र्स्टी के पास करोडों रूपयों रहते हुए भी उनमें से एक भी पाई उसकी नहीं होती । "
भारत लौटने पर उन्होने उपनिषदों का अध्ययन किया और उनसे प्रेरणा ली । उन्होने पाया कि प्रत्येक वस्तु पर ईश्वर का वास है । इसलिए उस पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार हो ही नहीं सकता । उस वस्तु का वास्तविक स्वामी तो ईश्वर है । गांधी जी पर इन धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पडा और इस तरह ट्र्स्टीशिप सिद्दांत का विचार उनके मस्तिष्क में आया ।
उन्होने " हरिजन " मे एक स्थान पर लिखा है " हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत में सच्चा समाजवाद दिया है । उन्होने हमें सिखाया है " सबै भूमि गोपाल की, वामे अटक कहां , जाके मन में अटक है, सोई अटक रहा ।  "
इसके अलावा राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के बहुवर्गीय चरित्र, भारत में अनियंत्रित पूंजीवाद दवारा किए जा रहे गरीबों के शोषण और राज्य की शक्ति के दुरूपयोग की आशंका आदि ऐसे कारण भी थे जिन्होने उन्हें अपने ट्र्स्टीशिप सिद्दांत को व्यापक स्वरूप प्रदान करने मे मदद की । गांधी जी पूंजीवाद की बुराइयों से अपरिचित नहीं थे । उन्हें मालूम था कि अनियंत्रित संपत्ति का नतीजा अंतत: यही होता है कि धनी लोग गरीबों का शोषण करके अथाह धन एकत्र करने की होड में जुटे रहते हैं । और इस तरह अमीर और गरीब के बीच की खाई बढती चली जाती है । लेकिन गांधी जी राज्य की शक्ति बढाने के पक्ष में भी नही थे । इसलिए वे उत्पादन के साधनों के विकेन्द्रीकरण के पक्ष मे अधिक थे ।
लेकिन उन्हें यह भी अच्छी तरह से मालूम था कि यह सब करना इतना आसान नहीं । वे उस वर्ग से विशेष रूप से चिंतित थे जो अंग्रेजी हुकूमत की जी हुजूरी में लगा हुआ था । समस्त सुविधाएं  प्राप्त यह वर्ग आमजन के हितों के बाते मे समाजवादी ढंग से सोचेगा, इस पर गांधी जी को शंका थी । उनका कहना था " सबसे बडी बाधा हमारे बीच, हमारे देश के ही वे निहित स्वार्थ हैं जो अंग्रेज शासन के देन हैं । "
ट्र्स्टीशिप की व्यवस्था धनी वर्ग आसानी से स्वीकार नहीं करेगा, इसका आभास उन्हें था । यही कारण रहा कि इसे लागू करने में उन्होने जल्दबाजी से काम नहीं लिया । वे चाहते थे कि इसके लिए अनुकूल माहौल बने तथा धनी वर्ग जो अंग्रेजी सरकार के तहत सारी सुविधाओं का उपभोग करता रहा है, स्वंय आगे आये । किसी प्रकार का दवाब डालने को वे अनुचित समझते थे । वे धनिक वर्ग को अधिक से अधिक समय देना चाहते थे ताकि वह स्वंय समय की मांग को महसूस कर सकें ।
बहरहाल देश स्वतंत्र हुआ तथा गांधी जी इसे लागू करने के लिए सोचने लगे । उन्होने कई महत्वपूर्ण लोगों से व्यापक विचार विमर्श किया । बडे बडे जमींदारों तथा उद्योगपतियों से उन्होने इस व्यवस्था को लागू करने की बात कही लेकिन उनकी असामयिक मृत्यु के साथ ही सब कुछ भुला दिया गया ।
कुछ समाजवादियों ने अपने प्रयास नये सिरे से प्रारंभ किए । डा. राममनोहर लोहिया ने 1967 में इसे संसद मे पेश करने का प्रयास किया लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इस पर बहस की इजाजत नहीं मिली । डा. लोहिया के प्र्यास बंद तो नहीं हुए, लेकिन इस बीच उनकी मृत्यु हो गई तथा इतिहास का यह महत्वपूर्ण पन्ना एक बार फिर बंद हो गया ।
ऐसा नहीं कि पुराने कांग्रेसी या समाजवादी इसे भूल गए हैं । उस दौर के कुछ लोग अब भी राजनीति मे सक्रिय हैं लेकिन अब उनकी संख्या बहुत कम हैं और जो हैं भी वे अब निहित स्वार्थों के चलते इसे याद नहीं करना चाहते । कालेधन व पूंजीपतियों की सहायता से चुनाव जीतने वाले ट्र्स्टीशिप की बात किससे कहें । वैसे लोहिया के बाद राजनारायण और जार्ज फर्नाडीज ने 1969 मे लोकसभा के पहले अधिवेशन मे इस मामले को उठाया भी  लेकिन वह बात किसी तरह टाल दी गई ।
बहरहाल अब इस सपने को अब लगभग भुला दिया गया है । सच तो यह है कि न तो गांधी रहे न ही गांधीवाद का वह दौर । सबकुछ बदल गया है । आज के हालातों में तो शायद ही कोई इस मुद्दे पर बात करना चाहेगा । अब तो यह बस इतिहास का एक हिस्सा बन कर रह गया है ।

एल.एस.बिष्ट,
11/508, इंदिरा नगर, लखनऊ-16
मेल - lsbisht089@gmail.com