Friday, 24 October 2014

हिमालय क्षेत्र के जंगलों से लुप्त होती जडी-बूटियां

           

( L.S. Bisht )     हिमालय क्षेत्र आदिकाल से अपने प्राकृतिक संसाधनों की द्र्ष्टि से समृध्द रहा है | यहां के वन और पहाड तमाम खनिजों व बहूमूल्य लकडियों के लिए तो जाने ही जाते हैं इसके साथ ही दुर्लभ जडी-बूटियों का भी भंडार यही हिमालय क्षेत्र है | परन्तु सरकार की उदासीनता तथा किसी योजना के अभाव में जडी-बूटियों के इस भंडार का यथोचित उपयोग नही हो पाया है और न ही स्थानीय लोगों को कोई विशेष लाभ पहुंचा है |
     इधर कुछ वर्षों से प्राकृतिक द्र्ष्टि से संपन्न इस हिमालय क्षेत्र का चौतरफ़ा शोषण हुआ है | वनों के निर्मम दोहन से लेकर खनिज दोहन तक की लंबी कहानी है |
     इस शोषण के विरूध्द जाग्रत चेतना का प्रतीक रहे हैं चिपको आन्दोलन व दून घाटी से उपजी पर्यावरण की संगठित लडाई , जिसका अपना एक इतिहास रहा है | आज उत्तराखंड के नंगे पहाड और चूना खदानों से आहत हुई दून घाटी के अलावा जहां तहां खनिज दोहन के फ़लस्वरूप घायल पडी पहाडियां इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं |
     बात सिर्फ़ यहीं तक सीमित नही रही | अभी उत्तराखंड के खामोश पहाड इस त्रासदी से उबर भी न सके थे कि सरकारी तंत्र की मिली भगत व वन विभाग की लापरवाही के फ़लस्वरूप पहाड के वनों से जडी-बूटियों की तस्करी भी होने लगी | इसका दुखद पहलू यह भी रहा कि काफ़ी समय तक इस संपदा के महत्व और उपयोगिता पर किसी का ध्यान गया ही नही | यह ऐसे ही चलता रहा |
     इस प्रवृत्ति के फ़लस्वरूप आज पहाड के वनों में अनेक चिकित्सोपयोगी जडी-बूटियों का अस्तित्व ही संकट में पड गया है | यही नही, बहूमूल्य औषधियों की खोज में कई दुर्लभ किस्म की वनस्पतियों को भी नष्ट किया जा रहा है |
     दुर्भाग्यपूर्ण पहलू तो यह है कि कई बार अवैध चोरी के ऐसे मामले पकडे भी जाते रहे हैं लेकिन सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्र्ष्टाचार के कारण कुछ नही हो पाता | आज भी उत्तराखंड के सुदूर जंगलों से जडी-बूटियों की चोरी बदस्तूर जारी है | इसके चलते तस्कर, ठेकेदार व शहरों के कुछ आयुर्वेदिक दवा कंपनियों के मालिक अपनी जेबें भर रहे हैं |
     यहां के अनेक स्थलों पर औषधियों का अथाह भंडार है | तुंगनाथ, मलारी, पवाली, बिनसर, डांडा क्षेत्र, द्रोणागिरी पर्वतमाला, टोंस घाटी क्षेत्र व मुन्स्यारी, नंदकोट आदि स्थानों पर अनेक दुर्लभ व बहूमूल्य जडी-बूटियां मिलती हैं | इसके अतिरिक्त तमाम रोगों में लाभकारी पहाडी फ़ल जैसे काफ़ल, किंगोड, हरड, रीठा, बेडू, हिसर तो लगभग पूरे उत्तराखंड में मिलते हैं | लेकिन आज यहां से इनका अवैध व्यापार हो रहा है | यही चीजे मैदानी शहरों मे कई गुना दामों पर बेची जा रही हैं |
     लाइलाज समझी जाने वाली अनेक बीमारियों में काम आने वाली जडी-बूटियों की इस क्षेत्र मे भरमार है | दमा, गठिया व उदरशूल के लिए तो यहां अनेक प्रभावकारी औषधि पौधे बहुतायत मे मौजूद हैं | सर्पदंश व अन्य किसी भी तरह के विष मे काम आने वाली औषधियां भी इस हिमालय क्षेत्र में मिलती हैं | परन्तु यहां के प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जो शोषण की प्रवत्ति पनपी है उससे इन जडी-बूटियों का अस्तित्व ही खतरे में पड गया है |
     कभी मंदाकनी घाटी मे सर्पगंधा व मृत संजीवनी बहुतायत में मिलती थी लेकिन आज बहुत तलाशने पर ही इनके दर्शन होते हैं | इसी तरह ब्रहमकुमारी, इसरमूल, वसींगा तथ अपराजिता आदि औषधियां भी संकट के दौर से गुजर रही हैं| शक्तिवर्धक कई औषधियां तो अब लुप्त होने की कगार में हैं | इन जडी-बूटियों का महत्व इस बात से ही पता चल जाता है कि आयुर्वेदिक चिकित्सा मे सर्पगंधा, मृत संजीवनी व अपराजिता जैसी औषधियों का कोई विकल्प नही है |
     हिमालय क्षेत्र में पायी जाने वाली इन औषधियों का स्थानीय लोगों के जीवन से गहरा संबध रहा है | आज भी सुदूर क्षेत्रों में लोग इन्हीं जडी-बूटियों से तमाम रोगों का इलाज स्वयं कर लेते हैं | सरकारी अस्पतालों की संख्या बहुत कम है जो हैं भी वह काफ़ी दूर | ऐसे में यह औषधियां ही इनके काम आती हैं | पहाड की पुरानी पीढी को इन औषधियों का अच्छा ज्ञान था लेकिन समय के साथ यह परंपरा भी खत्म हो रही है |
     आज चिंताजनक यह है कि हमारी गलत नीतियां व उपेक्षा से यह भंडार खतरे मे है | एक तरफ़ सरकार उदासीन है तो दूसरी तरफ़ स्वार्थी तत्व इन बहुमूल्य औषधियों का उपयोग अपने हित मे करने लगे हैं | कुल मिला कर वर्षों से संभाली यह धरोहर अब संकट के दौर से गुजर रही है |
     आज जरूरत इस बात की है कि हिमालय के इस क्षेत्र मे पायी जाने वाली इन जडी-बूटियों का योजनाबध्द अध्ययन व शोध हो तथा इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वन कानूनों मे भी परिवर्तन किया जाए जिससे इनके अवैध व्यापार को सख्ती से रोका जा सके | अगर समय रहते यह नही किया गया तो एकदिन हिमालय क्षेत्र में औषधियों का यह भंडार पूरी तरह रिक्त हो जायेगा |