Tuesday, 29 November 2016

जनभावनाओं को नकारने की राजनीति



भारतीय संसदीय इतिहास मे संभवत: यह पहला अवसर है जब विपक्ष ने बौखलाहट मे जनसमर्थन को नकारते हुए आत्मघाती कदम उठाने का दुस्साहस किया है  । जन भावनाओं को अनदेखा कर कालेधन को लेकर विपक्ष ने जिस तरह की राजनीति की और नोटबंदी के खिलाफ हुंकार भरी उसने राजनीति की दिशा पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है । आखिर यह कैसा विरोध है जिसमे जन भावनाओं को ही पूरी तरह से नजर-अंदाज कर दिया गया हो और उसके राजनीतिक परिणामों की तनिक भी परवाह न की गई हो ।  जब कि किसी भी लोकतांत्रिक देश् मे जनभावनाएं ही राजनीति की धुरी का काम करती हैं । उसके विरूध्द जाकर राजनीति करने की तो कल्पना भी नही की जा सकती ।

अगर सत्ता पक्ष जनभावनाओं के मद्देनजर अपनी योजनाओं व नीतियों का निर्धारण करता है तो विपक्ष भी जनभावनाओं को नजर-अंदाज किये जाने के आरोप को लेकर ही जनता के बीच अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करने मे कहीं पीछे दिखना नही चाहता । यानी कि संसदीय राजनीति जन-भावनाओं के इर्द गिर्द ही घूमती नजर आती है । लेकिन इधर विपक्ष की राजनीति के सुर कुछ अलग हैं  ।

इस नकारात्मक राजनीति की शुरूआत जे.एन.यू कन्हैया प्रकरण से मानी जा सकती है । इसके बाद तो मानो यह राजनीति ही विपक्ष का हथियार बन गई । देखा जाए तो भारतीय सेना दवारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर भी विपक्ष ने जिस नकारात्मक राजनीति का सहारा लिया, उसने देश के एक बडे वर्ग की भावनाओं को आहत करने का ही काम किया । यहां तक कि कुछ विपक्षी नेताओं के बोलों ने  तो भारत को ही कटघरे मे खडे करने का प्र्यास किया । विरोध की राजनीति के सरूर मे राष्ट्रहित कब आहत हो गया, इन्हें इसका आभास तक नही । देशहित को नजर-अंदाज कर विरोध की इस राजनीति से कई सवाल भी उठे ।

गौरतलब है कि ऐसा भी नही कि ऐसे हालात पहली बार बने हों । लेकिन ऐसी राष्ट्र विरोधी नकारात्मक राजनीति न तो 1971 के युध्द के समय नजर आई और न ही करगिल युद्ध के समय । इन अवसरों पर देश हित को ही महत्व देते हुए दलगत भावना से ऊपर उठ कर विपक्ष ने सरकार के फैसलों पर अपनी सहमति की मुहर लगाई । अगर कहीं कुछ मतभेद भी थे तो उन्हें इस तरह सार्वजनिक नही किया गया कि वह राष्ट्रहित के विरूध्द लगे । लेकिन इधर विपक्ष की राजनीति मे यह देशहित की भावना नदारत है और अब तो जन भावनाओं की भी अनदेखी की जाने लगी है ।

देखा जाए तो सवाल विरोध या वैचारिक मतभेदों का नही है । बल्कि जिस तरह से  विरोध को अभिव्यक्त किया जा रहा है, वह अवशय सोचने को मजबूर करता है । कालेधन को लेकर मोदी सरकार के फैसले पर जो नकारात्मकता संसद के अंदर व बाहर दिखाई दी व जिस तरह से जनभावनाओं को नजर-अंदाज किया गया, वह अवश्य एक गंभीर विश्लेषण की मांग करता है । क्या यह इस बात का संकेत है कि अब राजनीति मे राजनीतिक स्वार्थों का  महत्व ज्यादा व जनभावनाओं का कम होता जा रहा है ?

अगर निकट भविष्य मे राजनीतिक स्वार्थ व जनभावनाओं का टकराव होता है, जैसा कि नोटबंदी के मुद्दे पर साफ तौर पर दिखाई दिया, तो क्या  जनता की आवाज को भी हाशिये पर डाल कर राजनीति का खेल खेला जा सकता है ?

बहरहाल, कालेधन को लेकर नोटबंदी के मुद्दे पर जनता ने भी अपना फैसला सुना दिया है । राजनीतिक स्वार्थों के चलते विपक्ष की विरोध राजनीति को नकार कर यह संदेश भी दे दिया है कि जनता अब बहुत कुछ समझने लगी है । यह जरूरी नही कि वह उनके हर क्दम पर उनके साथ रहे । यह एक स्वस्थ संकेत है जिसका  भविष्य की राजनीति मे दूरगामी प्रभाव पडेगा । लेकिन जिस तरह से जनता की भावनाओं को नकारते हुए विपक्ष ने अपनी राजनीति का खेल खेलने मे भी  परहेज नही किया, इसने भी सोचने को मजबूर किया है कि आखिर जनसमर्थन की राजनीति की बजाय जनविरोध की यह कैसी राजनीति है जिसे अपनी ही कब्र खोदने का जोखिम भी स्वीकार है ।  

Sunday, 27 November 2016

गुजरे दौर की यादों का महोत्सव

कभी गोमती के किनारे बसा तहजीब का एक शहर था लखनऊ । नवाबों की नगरी, बागीचों का शहर लखनऊ | नवाबी काल मे अवध की राजधानी का अपना एक अलग चेहरा था परंतु एक महानगर में तब्दील होते इस शहर मे अब सब कुछ खडंहर व उजाड मे बदलने लगा है ।
अब लखनऊ नवाबों की नगरी नहीं, बल्कि ” साहबों ” और ” बाबूओं ” का शहर है । हजरतगंज जैसे आधुनिक बाजार में अब इक्के तांगे नहीं बल्कि चमचमाती कारें नई संस्कृति की पहचान स्वरूप दौडती दिख जायेंगी । इक्के-तांगों का तो य्हां आना वैसी
भी सरकारी रूप से वर्जित हो चुका है | नई हवा के प्रतीक आलीशान माल अब इस शहर की पहचान बन रहे हैं | यहां आपको सुनाई देगी अंग्रेजी की गिटर-पिटर और मेक-अप से लिपेपुते चेहरे | जिन्हें न तो तहजीब से कोई लेना देना है और न ही इस शहर की विरासत से |
कभी अवध की शाम का एक अलग ही रंग हुआ करता था जिसमे इत्र की महक और घुंघरूओं की झंकार सुनाई देती थी | अब इस शाम का मतलब है ” हजरतगंज की गंजिग ” | जहां फ़ैशनेबुल लडकी-लडकियों के झुंड बेतरतीब, बेमतलब घूमते नजर आते हैं | लखनऊ की तहजीब का जनाजा उठता यहां देखा जा सक्ता है |
पहले मैं ‘ मे तब्दील हो रहा है ‘ पहले आप ‘ का शहर | जिस आत्मीयता और सलीके का दुनिया मे कोई सानी नही था अब उसकी जगह है स्वार्थपरता और कपटपूर्ण व्यवहार | वह सादगी और सहजता गये दौर की बातें बन कर रह गई हैं
शहर की मुख्य सडकों के पीछे छोटी संकरी सडकों के खुले मेनहोल किसी भी आने-जाने वालों का स्वागत करने के लिए तैयार मिलेंगे | सडकों के किनारों और उनके बगल से निकलती नालियों मे दुर्गंध इतनी कि रूमाल नाक पर रखे बिना चलना दूभर हो जाए |
बागों के इस शहर का हरियाली से भी एक रिश्ता रहा है लेकिन अब हरियाली को निगल रहा है कंक्रीट का जंगल | पुराने ऐतिहासिक बागों का कोई पुरसाहाल नहीं | कई पुराने बाग तो न जाने कब दफ़न हो चुके हैं | कुछ बाग दिख जायेंगे लेकिन यहां भी सूखे पेड, मुरझाये फ़ूल और टूटे हुए झूले ही दिखाई देंगे | वैसे शहर को सुदंर बनाने के लिए जहां तहां नये बागों को विकसित करने का सिलसिला अब भी जारी है | लेकिन ये सैरगाह नहीं, असमाजिक तत्वों के अड्डे बन कर रह गये हैं | कोढ पर खाज यह कि आम आदमी को इनके अंदर आने के लिए भी टिकट लेना पडता है | यानी पैसा नही तो आपके लिए बाग का कोई मतलब नही |
शहर को आधुनिक बनाने के लिए बहुमंजिली इमारतों के निर्माण का सिलसिला अभी रूका नही है | परंतु इन सुंदर इमारतों के अंदर दीवारों पर जगह-जगह पान की पीक यहां की नई तहजीब के प्रमाण्स्वरूप नजर आयेंगे | समाजवादी व्यवस्था के गवाह के रूप मे इन आलीशान इमारतों के पीछे झुग्गियों की कतारें कभी भी देखी जा सकती हैं | यहां इनकी भी एक दुनिया है जो तेजी से बस रही है |
यह अब मंत्रियों, विधायकों तथा हडतालों व जुलूसों का भी शहर है | गांव-कस्बों से रोज यहां भीड उमडती है लेकिन शहर का वह मिजाज अब नहीं रहा | मंत्री जी या विधायक जी से अप्नी दुख दर्द की दास्तान कहने के लिए यहां वह तरस जाता है | अंत मे दलालों व छुटभैय्यों नेताओं दवारा दिखाये गये सब्जबाग भी सूखने लगते हैं और ये बेचारे वापस लौट जाते हैं अपने गांव , अपने शहर में | सच कितना बेदर्द हो गया है यह शहर|
कभी मेह्मान नवाजी के लिए भी लखनऊ दूर दूर तक जाना जाता था | कहा जाता है कि लखनऊ का वाशिंदा स्वयं तो चने खायेगा लेकिन मेहमान या दोस्त को झट काजू, किशमिश पेश करेगा | लेकिन अब शहर आये मेहमानों का लूट ख्सोट आम हो गई है | सरकारी कार्यालय के बाबू बिना ‘ सुविधा शुल्क ‘ कुछ करने को तैयार नही | यह बेरूखी व गैरपन अब शहर की मेहमाननवाजी का अंग बन गया है | बाहर से आये मेहमान को आश्चर्य होता है कि किताबों मे पढा, वह शहर क्या यही है | या फ़िर गलत जमीन पर उस शहर को तलाश रहा है |
वैसे तो बदलाव प्र्कृति का चक्र है | कुछ भी हमेशा एक सा नही रहता | लेकिन किसी दौर विशेष की यादों को सहेजना, समेटना भी जरूरी है | इसी सहेजना का एक प्रयास रहा है ‘ लखनऊ महोत्सव ‘ | जिसकी शुरूआत 1974 मे हुई थी लेकिन आज तक यह महोत्सव अपने उस मकसद से कोसों दूर दिखाई देता है | व्यावसायिक भोंडापन तक सीमित होकर रह गया है यह उत्सव | लखनऊ की तहजीब, व अवध की सोंधी महक से इस उत्सव का कोई रिश्ता आज तक नहीं बन पाया है |
नौकरशाही के दबदबे के नीचे आयोजित किए जाने वाले इस महोत्सव की इतनी भी पह्चान नही बन पाई है देश-विदेश के पर्यटक यहां आयें | जबकि दूसरी तरफ़ मरू महोत्सव, खजुराहो महोत्सव व सूरजकुंड महोत्सव अपनी पुख्ता पहचान बना पाने मे सफ़ल रहे हैं | यह महोत्सव देसी पर्यटकों के साथ विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं |
दर-असल इसके चरित्र को देखते हुए तो ऐसा प्रतीत होता है कि इस उत्सव का असली मक्सद अवध की तहजीब के नाम पर स्टाल लगा कर तहजीब व लखनवी कला तथा व्यजनों को बेचना ्भर  है | संस्कृति का इससे कोई रिश्ता बनता दिखाई नही देता | रही सही कसर पूरी कर देते हैं यहां आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम | इनमे देश के नामी गिरामी महंगे कलाकारों को बुला कर जनता की वाही वाही लुटी जाती है | अवध के लोक नृत्यों व संगीत की सुध लेने वाला कोई नही | अवधी भक्ति संगीत, शास्त्रीय संगीत, धोबिया नृत्य , स्वांग और नौटंकी इन्हें नही याद आती | कभी कधार खाना पूरी का प्र्यासभर होता है | वह भी सतही |
पटेबाजी या लठ्ट्बाजी कभी यहां की पहचान थी | यह अपने दुश्मनों से निपटने की ऐसी कला थी कि एक अच्छा पटाबाज कई कई लोगों से अकेले लोहा ले सक्ता था | लेकिन जरा से चूके तो बस | लेकिन यह कहां गुम हो गई, पता नहीं | अलबत्ता गली गली कुकरमुत्तों की तरह जूडो-कराटे सिखाने और ‘ सिक्स पैक ‘ बनाने की दुकानें जरूर खुल गई हैं |
किन्नरों ( हिजडों ) का भी नवाबी काल मे एक अलग मह्त्व रहा है | इनके विचित्र रस्मो-रिवाज कहानी किस्सों मे आज भी मौजूद हैं | क्भी लखनऊ के ऐशबाग मे इन हिजडों का एक अनोखा मेला भी लगता था | इसे ‘ अलौला का मेला ‘ कहा जाता था | इसकी परंपरा नवाबी काल से रही है | इसमे बहुत बडी संख्या मे हिजडे शरीक हुआ करते थे | अभी हाल के वर्षों तक यह किसी तरह अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा था लेकिन इधर यह भी इतिहास मे दफ़न हो गया | किसी न किसी रूप मे किन्नरों के इस मेले व उनकी नवाबी दौर की जिंदगी को मेले से जोडा जा सकता है जिससे नई पीढी इनके बारे मे भी समझ सकें लेकिन ऐसा विचार कोसों दूर है
बहरहाल मानवीय संवेदनाओं का कब्रगाह बनता यह शहर फ़िर भी कुछ अलग तो है ही | आज भी यह एक पीढी के दिलो दिमाग मे धडकता है | लेकिन सच यह भी है कि हर साल आयोजित किए जाने वाला ‘ लखनऊ महोत्सव ‘ उन यादों को  समेटने व सहेजने मे कहीं से भी सफ़ल होता नहीं दिखता | हर संवेदनशील लखनऊ का वाशिंदा इस बात से कहीं चिंतित है कि नई पीढी बीते दौर के उस लखनऊ को महसूस भी करे तो आखिर कैसे |



Tuesday, 15 November 2016

कहीं हम भी खडे हैं कटघरे मे


  मौजूदा समय मे देश दो बडी समस्याओं से जूझ रहा है । एक तरफ देश मे बढता भ्र्ष्टाचार है तो दूसरी तरफ बढता प्रदूषण  । ऐसा भी नही कि इन्हें गंभीरता से नही लिया गया । सरकारी स्तर पर प्रयास भी किये गये । लेकिन कुल मिला कर वही ढाक के तीन पात । अभी हाल मे सर्द मौसम की शुरूआत मे जिस तरह से दिल्ली मे सांस लेना दूभर हो गया था और लोगों को पूरी दिल्ली एक गैस चैम्बर मे रूप मे नजर आने लगी थी , उसने पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा । सिर्फ दिल्ली ही नही उत्तर प्रदेश , पंजाब, हरियाणा मे भी कई स्थानों मे यही हालात बने । लेकिन आम प्रचलित भारतीय त्रासदी यह है कि हालात थोडा ठीक हो जाने पर सबकुछ भुला दिया जाता है । कुछ ऐसी ही कहानी है देश मे बढते भ्र्ष्टाचार की । आजादी के कुछ समय बाद लगभग सत्तर के दशक से ही भ्र्ष्टाचार पर बातें की जाने लगी थीं । देश मे बढते राजनीतिक भ्र्ष्टाचार के साथ नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर भी संसद के अंदर व बाहर चर्चायें व बहस शुरू हो चुकी थी । लेकिन इधर हाल के वर्षों मे देश की अर्थव्यवस्था को जिस प्रकार काले धन के व्यापक प्रसार ने चोट पहुंचाई उसने सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया । लेकिन त्रासदी यह रही कि काले धन व बढते प्रदुषण पर  बातें तो बहुत की जाने लगीं लेकिन ठोस और प्रभावी सार्थक प्रयासों के अभाव मे हालात जस के तस बने रहे ।

इधर  पूरी दुनिया मे बिगडते प्रर्यावरण को लेकर  जो गहरी चिंता जाहिर की गई उसने भारत जैसे सोये हुए देश को भी जगाने का काम किया । फलस्वरूप  प्रर्यावरण को बचाने के लिए कुछ ठोस प्रयासों की शुरूआत भी की गई लेकिन यहां तो हर कुंए मे भांग पडी थी  । सामाजिक हित वाले इन प्रयासों के संदर्भ मे जब हमने  समाज की ओर देखा तो यहां एक आत्मकेन्द्रित, स्वार्थपूर्ण समाज ही दिखाई दिया  । जिसे देश मे लोगों को समाज  हित से ज्यादा अपने हित सुहाते हों    वहां  अच्छे प्रयासों की अकाल मौत का होना कोई अचरज की बात नही ।


सामाजिक  हित के लिए किये गये  तमाम प्रयासों मे  शायद ही आशातीत परिणाम मिले हों । बढते प्रदूषण को रोकने के लिए प्लास्टिक के उपयोग पर रोक लगाने के प्रयास किये गये । थोडे समय के लिए कुछ अच्छे संकेत मिले भी लेकिन बहुत जल्द सबकुछ भुला दिया गया । बाजारों व दुकानों मे तथा दैनिक उपयोग मे प्लास्टिक की पन्नियों का धडल्ले से उपयोग आज भी जारी है । चुनाव प्रचार मे भी प्लास्टिक से बनी सामग्री का उपयोग बद्स्तूर जारी है । इसी तरह सार्वजनिक स्थलों मे ध्रुमपाम न करने के लिए कानून बनाया गया । इसके लिए दंड का भी प्राविधान है लेकिन लचर क्रियांवयन के चलते यह भी बस एक कानून बन कर रह गया है । लोगों को सार्वजनिक स्थलों पर ध्रुमपान करते देखा जा सकता है । तंबाकू गुटका पर रोक लगाई गई लेकिन कानून को बाई पास करके आज भी लोग धडल्ले से उसका उपयोग कर रहे हैं । बस फर्क यह है कि तम्बाकू पाउच  और सादे  मसाले के पाउच को अलग  अलग करके बेचा जा रहा है ।



अब रही बात देश को स्वच्छ रखने की तो वह देश साफ सुथरे रह सकते हैं  जहां के नागरिक कूडेदान न मिलने पर केले का छिलका या पैकेट का रेपर अपनी जेब मे डालना बेहतर समझते हैं बजाय इसके कि उसे सडक पर फेंक दें । आज हम जिन यूरोपीय देशों के अनुसरण करने की बात करते हैं वहां की बेहतरी मे कानून से ज्यादा नागरिकों के ' सिविक सेंस ' की भूमिका महत्वपूर्ण है ।  लेकिन यहां तो अपना कूडा पडोसी के घर के सामने डाल देने मात्र से ही सफाई का कर्तव्य पूरा हो जाता है । बाकी सफाई तो बहुत दूर की बात है । अब ऐसे मे कैसे पूरा हो स्वच्छ भारत का सपना । चार दिन का तमाशा करना एक अलग बात है ।

प्रदूषण से ज्यादा जहां दिखावे की प्रवत्ति सोच मे प्रभावी हो तथा कार एक स्टेटस सिम्बल हो और रिश्तेदारों को दिखाने की चीज हो वहां सडकों पर कारों की संख्या को सीमित किया जा सकेगा, मुश्किल ही लगता है ।

हमारी स्वार्थी मानसिकता का नजारा आजकल बैकों के बाहर भी देखा जा सकता है । काले धन को लेकर सरकार ने 500 व 1000 रूपये के नोट बंद करके एक साहसिक फैसला लिया । जनता को परेशानी न हो इसलिए इन नोटो के बदले नये नोटो को बदलने की सुविधा भी प्रदान की और साथ ही किसी भी सीमा तक बैंक मे पुराने नोटों को जमा करने की सुविधा भी । लेकिन जल्दी ही इन सुविधाओं मे हमारी स्वार्थी सोच का ग्रहण लगना शुरू हो गया । ' ईमानदार ' कहे जाने वाले लोगों ने कमीशन लेकर अपनी पहचान पर ( आई. डी ) काले कारोबारियों के काले पैसों को नये नोटों से बदलना शुरू कर दिया । यही नही  कई ने तो बहती गंगा मे हाथ धोते हुए अपने खातों मे भ्र्ष्टाचारियों के पैसे भी जमा करने का काम बखूबी शुरू कर दिया । यानी जिन काले धन धारकों के विरूध्द यह मुहिम शूरू की गई थी पैसे लेकर उनकी ही मदद की जाने लगी । तुर्रा यह कि यही लोग यह कहते नही थक रहे कि मोदी सरकार ने बहुत अच्छा काम किया है । यह ईमानदारी की एक अलग किस्म है जो अब दिखाई दे रही है ।



दर-असल देखा जाए तो  आजादी के बाद से ही  हमें वह संस्कार ही नही मिले जिनसे राष्ट्रहित हमारी सोच मे सर्वोपरि होता  । जिन देशों का  अनुसरण करने का प्र्यास किया जा रहा है वहां लोगों को राष्ट्र्भक्ति , राष्ट्रहित व सामाजिक सरोकार जन्म से ही  घुट्टी मे पिलाये गये हैं । यहां तो विकास और समृध्दि को जो दिशा दी गई उसमें इन विचारों का कोई स्थान ही नही है । भारतीय समाज मे  आत्मकेन्द्रित खुशहाली की सोच के बीच भला राष्ट्रहित से किसी को  क्या मतलब ।